Thursday, October 27, 2011

एक भुतही प्रेम कथा Ghost Love Story

मेरी मां के कथनानुसार, जो कहानी मैं आपको सुनाने जा रहा हूं, सर्वथा सत्य है।

आज से लगभग सौ साल पहले भारत के किसी गांव में एक युवा किसान दम्पति और किसान की मां रहते थे। दुर्भाग्यवश एक दुर्घटना में किसान की मृत्यु हो गई। किसान की पत्नी रोज शुबह जल्दी उठ कर चक्की से आटा पीसती थी। किसान की मां को बहू को इतना सारा काम करते हुए देखते बडा कष्ट होता था। बहू ने कहा, ''मांमुझे तो कुछ भी नहीं करना पडता। वे आ जाते हैं और कहते हैंचल पिसादें। सारा जोर वह लगाते हैंमैं तो केवल मूठ पर हाथ लगाए रखती हूं। सवेरा होने के पहले ही चले जाते हैं।'' मां कुछ ज्यादा नहीं बोलीबस अच्छा कह कर चुप हो गई। दूसरे दिन मां छिप के बेटे के आने का इन्तजार करती रही। जब किसान का भूत चक्की पिसा कर उठ के जाने वाला था, मां ने झपट कर पीछे से उसकी चोटी काट ली। किसान वगैर चोटी के उडने में असमर्थ था। क्या करता, फिर से रह कर खेती बाडी क़रने लगा। उसके दो बच्चे भी हुए, एक लडक़ा और एक लडक़ी।

इस बात को कई साल हो गए और अब किसान की लडक़ी की शादी होने वाली थी। आंगन में मंडप लगाया गया और फेरे होने वाले थे। किसान ने अपनी मां से कहा, ''मां, आज तो मुझे मेरी चोटी दे  दे जिससे बिटिया की शादी में जी भर कर नाच लूं।'' यहीं पर बुढिया चूक गई। उसने चोटी लाकर बेटे के हाथ में दी। चोटी लेकर किसान खूब नाचा और मंडप के बीच से हवा बन कर चिडिया की तरह फुर्र से उड क़र निकल गया। वह फिर कभी लौट कर नहीं आया। आज तक उस किसान का परिवार भुतहा कहलाता है। 

Friday, October 7, 2011

Love Later


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My Dear
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Wednesday, August 3, 2011

माँ कर्मा देवी SAHU FAMILY


|| साहू समाज की अमर ज्योति भक्त शिरोमणि माँ कर्मा देवी की अमर गाथा ||

        उत्तर प्रदेश मे झाँसी एक दर्शनीय एतिहासिक नगर है। यहाँ के प्राचीन भव्य किले, अधगिरी इमारतें और दूर-दूर तक फैले खंडहर आज भी एतिहासिक भूमि की गौरवपूर्ण गाथा को अपनी मूक भाषा में कह रहे है।    इसी एतिहासिक नगर में लगभग एक हज़ार वर्ष पूर्व राम साह एक सम्मानित व्यक्ति थे! दीन दुखियों के प्रति दया-भावना, दानशीलता, सरल स्वभाव,धर्म-परायणता आदि उनके विशेष गुण थे,  और इसी कारण उनका यश दूर-दूर तक फैला हुआ था। इन्हीं के घर हिन्दुकुल और समस्त साहू समाज को गौरव प्रदान करने वाली भक्त शिरोमणि कर्मा माता का जन्म चैत्र कृष्ण पक्ष ११ संवत १०७३ को हुआ था। माँ कर्मा वाघरी वंशीय समुदाय के वैश्य समुदाय से है। अपने माता पिता की एकमात्र संतान होने के कारण कर्मा बाई का पालन पोषण बड़े ही लाड प्यार से किया गया। वह बाल्यकाल से ही बड़ी होनहार थी।        उसे भक्तिपूर्ण कहानियाँ सुनने तथा सुनाने का बड़ा चाव था। नियमित रूप से वह अपने पिता के साथ श्री कृष्ण की मूर्ति के सम्मुख भजन गाती थी।  उसके मनोहर गीत सुनकर भक्तागन झूमने लगते थे और राम साह के नेत्रों से तो अश्रुधार बह निकलती थी।
 'होनहार बिरवान के होत चीकने पात'
           कर्मा के कृष्ण भक्ति पूर्ण गीत उनके बाल्यकाल से ही जनसाधारण में प्रचलित हो, गाए जाने लगे। सम्पूर्ण झाँसी जनपद में उनकी भक्ति-भावना आदर प्राप्त कर धीरे धीरे उत्तरप्रदेश में विस्तार से फैलने लगी तभी राम साह ने अनुभव किया कि वह विवाह योग्य हो गई हैं फिर शीघ्र उसका विवाह संस्कार नरवर के प्रसिद्ध साहूकार के पुत्र पदमजी साहूकार के साथ कर दिया गया। एक दिन कर्मा बाई अपने समस्त गृह्कार्यों से निवृत हो श्री कृष्ण भगवान की भक्ति में नेत्र मूंदे भजन गा रही थी तो उनके पति ने प्रमाद में आकर सिहांसन से भगवान की को हटा कर छिपा दिया और स्वयं भी वहाँ से हट गए। कुछ समय पश्चात् जब कर्मा ने नेत्र खोले तो मूर्ति सिहांसन पर न देख बहुत घबराई और मूर्छित होकर गिर गई! जब उसे होश आया तो उसके पास ही बैठे पति को देख कर उठ खड़ी हुई। और पति के चरणों मे गिरकर अत्यन्त विनम्रतापूर्वक बोली-"प्राणनाथ! ईश्वर ही संसार का स्वामी है, उसने ही सरे संसार को बनाया है। हम दोनों को भी मानव देह उसी कृपालु भगवन की दया प्राप्त हुआ है। उस कृपालु भगवान, जो सबकी रक्षा करते है, की मूर्ति सिहांसन से गायब हो गई है।"
        कर्मा की यह दशा देखकर उनके पति को अपने किए कृत्य पर पछतावा हुआ और उसकी इसी प्रकार मधुर भक्ति पूर्ण वाणी को सुन कर वे रोने लगे। उन्होंने अपनी धर्मशील पत्नी को प्रेम से उठाकर क्षमा मांगते हुआ कहा-"यह महान भूल मैंने ही की थी। ये लो मूर्ति, किन्तु प्रिय मैं यह जानना चाहता हूँ कि तुम दिन रात भगवान की भक्ति करती हो, भजन गया करती हो। क्या तुम्हें उनके प्रत्यक्ष दर्शन मिले है?" पति की बातों को ध्यान से सुनकर कर्मा ने समझाते हुए कहा-"नाथ! ईश्वर बड़ा दयालू है। उसकी कृपा से ही संसार के सभी प्राणी भर पेट भोजन पाते है। वह अपने भक्तों कभी निराश करते और दर्शन भी अवश्य देते है। किन्तु परीक्षा करने के पश्चात्। अभी मेरी तपस्या पूर्ण नही हुई है।       मुझे भगवान की सेवा करने का अवसर प्रदान करो।  मुझे विश्वास है की भगवान दर्शन अवश्य देंगे। " कर्मा की इस प्रकार विनम्र और भक्ति पूर्ण बातों से अत्यधिक प्रभावित होकर उनके पति बोले-"प्रिये! आज से तुम्हे भगवान् की सेवा कराने के लिए पुरी स्वतंत्रता है मेरी सेवा मैं तुम व्यर्थ ही अपना अमूल्य समय नष्ट करती हो  अब तुम सारा समय भगवान् की पूजा और भक्ति मैं ही लगाया करो, जिससे तुम्हारे साथ ही मुझे भी मुक्ति मिल जाय!
     धार्मिक कार्यों मैं अत्यधिक रूचि, दीन-दुखियों के प्रति दया भावना और अन्य महत्वपूर्ण कार्यों         मैं तन-मन-धन से लगे होने के कारण कर्मा का यश नरवर (ससुराल) में फैलने लगा जिसे अन्य समाज के कुछ पाखंडी लोग सहन न कर सके उन लोगो ने एक षड्यंत्र रचा एस षड्यंत्र के अंतर्गत नरवर के राजा की सवारी के हाथी को एक असाध्य रोग हो गया राज्य के बड़े-बड़े वैद्यों ने नाना प्रकार के बहुमूल्य ओषधियों का प्रयोग किया किन्तु राजा के प्रिय हाथी को कोई लाभ नहीं हुआ। अंत में षड्यंत्रकारियों के इशारे पर पुरोहितों ने राजा को बताया की यदि हाथी को तेल से भरे कुंड में स्नान कराया जाए तो इसकी बीमारी अवश्य जा सकती है।  उन पुरोहितों ने राजा से तेल की समस्या का समाधान बतलाया की यदि राज्य के सभी तैलकार नित्यप्रति अपना समस्त तेल कुंड में डाले तो कुंड शीघ्र ही भरा जा सकता है जिसमें हाथी को डुबोया जा सकता है।
    राजा ने पुरोहितों की राय मान ली और उसी समय राज्य के कर्मचारियों को तेल एकत्र कराने हेतु आवश्यक आदेश दे दिए गए। राजा के आदेशानुसार नरवर राज्य मे निवास कराने वाले सभी तैलकार अपना तेल नित्य प्रति कुंड में डालने लगे, जिसका मूल्य उन्हें राजा की और से कुछ भी नहीं दिया जाने लगा। राजा के इस अन्यायपूर्ण कार्य से अनेक निर्धन तैलकार भूखे मरने लगे। कर्मा के पति भी इसी विषम आर्थिक परिस्तिथि को देखकर अत्यधिक चिंतित और दुखी रहने लगे।

लगभग एक मास व्यतीत हो गया, किन्तु कुंड तेल से न भरा जा सका। सभी तैलकार इस दुखद घटना से अत्यधिक परेशान हो उठे कर्मा के पति की चिंता भी बढ़ती जा रही थी। एक दिवस अपने पति को अत्यधिक दुखी देख कर जब कर्मा ने पति से कारण पूछा तो उन्होंने समस्त घटना कह सुनाई।

नरवर के अन्यायी राजा के अत्याचार की कथा को सुनकर कर्मा के नेत्रों में आंसू भर आए। वह दौड़कर भगवान् श्री कृष्ण के चरणों में गयी और गिरकर कहने लगी-"भगवान् यह सब क्या हो रहा है? मेरे कारण आज राज्य के कितने ही निर्धन तैलकर भूखे मर रहे हैं | किन्तु कुछ भी हो लीलामय प्रभु! आपकी यह दासी अब आप की सेवा में पीछे नहीं हट सकती। मेने आपकी सदा सेवा ही की है, और करूंगी, किन्तु, हे दिनों के नाथ! इन निर्धनों की रक्षा अब आवश्यक ही है। मैंने आज तक आपसे कुछ नहीं माँगा है दयाबंधु! आप की यह दासी आज प्रथम बार भिक्षा मांग रही है। अब कुछ एसी माया फैलाइये, जिससे अन्यायी राजा का कुंड तेल से भर जाए और राज्य के समस्त तैलकार इस पीड़ा से छुटकारा पा जावें।

 भगवान् श्री कृष्ण ने बाल रूप में माँ कर्मा को दर्शन दिए और कहा कि आप चिंता न करें। आप राजा से कहिये कि आपके घर के कोल्हू से तालाब कुंड तक पक्की नाली बनवा दें, तालाब कुंड से भर जायेगा। सुबह माँ कर्मा ने अपने पति द्वारा राजा को यह संदेशा भिजवाया। राजा ने पक्की नाली बनवा दी।  माँ कर्मा और उनके पति ने इष्टदेव का ध्यान किया और सारी रात कोल्हू चलाया। सुबह देखा तो तालाब कुंड तेल से भर गया। यह घटना सारे नरवर में आग की भांति फ़ैल गयी और कर्मा माता की जय-जयकार होने लगी।

 ईश्वर की माया अपरम्पार होती है, जिसको समझ पाना साधारण मनुष्य के बस की बात नहीं होती। दुःख के बाद सुख और सुख के बाद दुःख इस मायावी संसार का नित्य व्यापार है। मृत्यु भी इसी से संबंधित एक एसी घटना है जो वाली नहीं होती। इसका एक निश्चित समय होता है और यां ठीक समय पर मनुष्य को प्राप्त होती है।

कर्मा के पति अचानक बीमार हो गए। उनकी दशा अत्यंत ही गंभीर हो गई। जीवन की कोई आशा न देख कर्मा अत्यन्त दुखी हुई। उसके प्राण सूख गए। शरीर थर-थर कापनें लगा। वह खड़ी न रह सकी और बेहोश होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। होश आने पर पति का जीवन दीपक बुझ चुका था। कर्मा के माता पिता व अन्य कुटुम्बियों ने मृत-शरीर को नीचे उतरकर रख दिया था। कर्मा दौड़कर भगवान् श्रीकृष्ण के सम्मुख गई और चरणों में गिर कर फुट-फुट कर कहने लगी -"भगवान्! तुमने मेरा सुहाग क्यों छीन लिया?  मुझे विधवा क्यों बना दिया?  तुम्हें अपने दीं भक्तों पर तो दया करनी चाहिए।"

भक्त कर्मा के करुण क्रंदन को सुनकर भगवान् श्री कृष्ण जी का सिहांसन हिल गया। अपने भक्त की एसी करुण दशा देख कर वे स्वयं को रोक न सके और तुरंत ही दौड़ पड़े। कर्मा को एक अभूतपूर्व मधुरवानी सुनाई दी -"भक्त कर्मा तू इतनी दुखी न हो। आना जाना तो इस संसार का क्रम है। इसे रोका जाना उचित नहीं। इस संसार में जो भी आता है, एक न एक दीन उसे जाना ही अवश्य होता है। यही संसार है। तेरे पति का इतना ही जीवन था, जिसे समाप्त कर वे चले गए। जाओ, अपने पति का क्रिया कर्म करो। अब तुम्हारा पति के प्रति यही धर्मं है।

 कर्मा ने चारों और देखा। ये मधुर शब्द कौन कह रहा है? किन्तु उसे कुछ भी न दिखाई दिया। ईश्वर की प्रेरणा से उसकी स्मृति जाग उठी। वह समझ गई की यह भगवान् ही बोल रहें है। इस प्रकार भगवान् की मधुरवानी को सुनकर कर्मा ने कहा प्रभु"! आपके आदेशानुसार मैं जा रहीं हूँ। सदा के लिए जा रहीं हूँ। पति के साथ सती होकर अपने जीवन का निर्वाह अवश्य करूंगी, किन्तु इस अन्तिम समय में मुझे अपने दर्शन देकर मेरे जीवन को सार्थक तो कर दो।"

 कर्मा की विनती सुनकर भगवान् पुनः बोले -"कर्मा तू अभी गर्भवती है और गर्भवती नारी का सती होना महान पाप है। ऐसी दशा में तेरा सती होना कदापि उचित नहीं। जाओ अपने पति का क्रिया-कर्म करो और शेष जीवन भक्ति-भाव से धैर्यपूर्वक व्यतीत करो। मैं तुम्हें जगन्नाथपुरी में साक्षात् दर्शन दूंगा!"

 भगवान् की यह आकाशवाणी सुनकर कर्मा ने अपने पति के साथ सती होने का विचार त्याग दिया।  वह फूट-फूट कर विलाप कराती रही और उसके पति को सदा के लिए पंच तत्व में मिया दिया गया।

पति के देवहासन के लगभग तीन माह पश्चात् कर्मा को पुत्र रत्न प्राप्त हुआ। किन्तु कर्मा को इससे कोई विशेष हर्ष न हुआ। वह अपने पति की स्मृति अभी तक भूली न थी और वह उनके वियोग में रोती तथा विलाप करती रहती थी।

समय की गति बड़ी तीव्र होती है। वह तेजी से व्यतीत होता रहता है। दोनों बालकों के लालन-पालन और भगवान् की भक्ति में तीन वर्ष का समय व्यतीत हो गया। अब कर्मा की भगवान् के दर्शन करने की उमंग प्रतिदिन बड़ने लगी। एक दिन आधी रात का समय था। कर्मा के घर में सभी लोग गहरी निन्द्रा में सो रहे थे। वह उठी और अपने बूढे माता-पिता तथा दोनों बालकों को सोता हुआ छोड़ कर चुपचाप घर से निकल गई। ईश्वर की भक्ति में मतवाली कर्मा भगवान् के दर्शन हेतु रात्रि के गहन अन्धकार को चीरती हुई जगन्नाथपुरी मार्ग पर दौड़ती चली जा रही थी। रात भर वह कितनी दूर निकल गई, उसे कुछ ज्ञात नहीं।

 दूसरे दिन प्रात: काल कर्मा नित्यकर्म से निवृत हो भगवान् का भजन कर पुनः आगे ही और चल दी। मार्ग में वह क्षुधा से पीड़ित होने लगी किन्तु खाने को उनकी पोटली में कुछ न था। केवल थोडी सी खिचडी पुरी में भगवान् का भोग लगाने के उद्देश्य से उसकी पोटली में बंधी थी। अंत में जब भूख असह्य हो गई तो उन्होंने वृक्षों की पत्तियाँ तोड़ कर खायीं और फिर आगे जगन्नाथपुरी की और भगवान् के दर्शन हेतु चल दी।

पैदल चलते चलते कर्मा को रात हो गई। वह एक पेड़ के निचे लेट गई। भूख और थकावट से परेशान कर्मा को नींद नहीं आ रही थी। वह लेते हुए विचार कराने लगी- भगवान्! आपने जगन्नाथपुरी में दर्शन देने का विश्वास दिलाया था किन्तु पुरी तो यहाँ से न जाने कितनी दूर है और मुझे मार्ग भी ठीक से मालूम नहीं है। ऐसी दशा में वहां कब और कैसे पहूचुंगी। प्रभु! अब तो बस आपका ही सहारा है। मई तो अपने घर से निकल चुकी हूँ और अब मुझे चाहे कितने ही कष्ट क्यों न सहन कराने पड़े मैं आप के दर्शन करके ही लौटूँगी।

 इस प्रकार भगवान् के दर्शन हेतु द्रढ प्रतिज्ञा करते हुए कर्मा सो गई। ईधर भगवान् भी कर्मा की द्रढ़ता और भक्ति भावना को देखकर आश्चर्य चकित थे। उनसे कर्मा का भूखा रह कर सारा दिन पैदल चलना सहन नहीं हुआ। उन्होंने माया से कर्मा को उसी प्रकार सोते हुए जगन्नाथपुरी पहुँचा दिया।

 दुसरे दिन सूर्योदय होने पर कर्मा की आँखे खुली। उसने आश्चर्य चकित हो अपने चारो और देखा और सोचने लगी - मैं यहाँ कैसे आ गई हूँ? मुझे यहाँ कौन लाया है और यह कौन सा स्थान है? उसने वहां के निवासियों से पूछा। वहां के लागों के बताने पर जब उसे यह पता चला की यह जगन्नाथपुरी है तो उसे भगवान् की माया समझते देर न लगी। वह अत्यधिक प्रसन्न हो मन्दिर की और चल दी।

 भगवान् के भजन गाती हुई कर्मा भगवान् जगन्नाथजी के विराट मन्दिर में जा पहुँची। उस समय मन्दिर में भगवान् की आरती चल रही थी। ब्राह्मणों की टोलियाँ मन्दिर में प्रवेष कर रही थी। कर्मा भी भगवान् के दर्शनार्थ मन्दिर में जाने लगी किन्तु उसके फटे पुराने वस्त्र देख द्वारपाल ने उस मन्दिर में जाने नहीं दिया। द्वारपाल ने कर्मा से डांट कर कहा की मन्दिर में केवल ब्राह्मण ही प्रवेष पा सकते हैं। इसके अतिरिक्त कोई अन्य प्रवेष नहीं कर सकता।

 द्वारपाल की बातों से कर्मा को बड़ी निराशा हुई। वह अत्यन्त दुखी होकर कहने लगी - भगवान् तो सभी के हैं फिर मुझे भीतर जाने क्यों नहीं दिया जा रहा। भक्त कर्मा इतना ही कहा पाई थी की मोटे शरीर वाले जनेउधारी ब्रह्मण ने उसे जोर से धक्का दिया। वह सीढियों से निचे गिर गई। उसके सिर से रक्त की धारा बह निकली और वह पृथ्वी पर गिरते ही बेहोंश हो गई।

 जब कर्मा को होंश आया तो उसने स्वयं को मन्दिर की सीढियों पर न पाकर समुद्र के किनारे पाया। उसने आँखों में आंसू भर कर भगवान् से विनती की -"हे दीनानाथ! दयामय भगवान्! आपके दर्शनार्थ दूर दूर से आए भक्तों की यहाँ इन पाखंडी ब्राह्मणों द्वारा यह दुर्दशा की जाती है क्या इन लोगों का आप पर इस प्रकार एकाधिकार अनुचित नहीं? आप इन मंदिरों से बाहर निकलकर इस अनैतिक सामाजिक दोष को सदा के लिए समाप्त क्यों नहीं करते?"

 कर्मा की विनती सुनकर भगवान् ने आकाशवाणी की -"भक्त कर्मा! मैं केवल मंदिरों में ही निवास नहीं करता हूँ। मेरा सर्वत्र निवास स्थान है। तू दुखी न हो, मैं तेरे पास स्वयं मन्दिर से आ रहा हूँ।"

 भगवान् की आकाशवाणी सुनकर कर्मा को बड़ा संतोष हुआ। उसके कमजोर शरीर में पुनः स्फूर्ति का अनुभव हुआ और जैसे ही उसने अपना सर उठाया, भगवान् की एक अतिसुन्दर विराट मूर्ति उसके सम्मुख विराजमान थी।

भगवान् की मूर्ति को मन्दिर में अपने स्थान से गायब देखकर ब्राह्मणों में हाहाकार मच गया। उसी समय मूर्ति की खोज में चारों और लोगों को दौडाया गया। शीघ्र ही मूर्ति के समुद्र तट पर पहूँचने का समाचार पूरे नगर में फैल गया। सभी लोग भगवान् के इस अदभूत चमत्कार को देखने के लिए चल पड़े और देखते ही देखते समुद्र तट पर अपार जन समूह एकत्र हो गया।

 समुद्र पर विराजमान भगवान् की मूर्ति के चरणों में भक्त कर्मा को पड़े देख ब्रह्मण पुनः क्रोधित हो उसे भगवान् के चरणों से हटाने के लिए आगे बढे किन्तु आकाशवाणी हुई -"सावधान! कोई भी व्यक्ति इस नारी को हाथ न लगाये। यह भक्त कर्मा है। उसे तुम लोगों ने धक्का देकर मन्दिर से बाहर निकल दिया। इसी कारण मुझे स्वयं यहाँ आना पड़ा है।"

 आकाशवाणी सुनकर सभी आश्चर्य चकित एक-दुसरे का मुहं देखने लगे। कर्मा ने उठ कर अपनी पोटली खोली, उसमें बंधी खिचडी से भगवान् का भोग लगाके सबको बांटने लगी। कर्मा वहीं बेसुध भगवान् के चरणों में पड़ी रही। मन्दिर से धकेले जाने पर लगी चोट की पीडा असह्य हो रही थी, उसके प्राण घबरा रहे थे। तभी आकाशवाणी सुने दी -"मेरी पुत्री कर्मा !! उठ खड़ी हो, अचेत क्यों पड़ी हो? देख मैं तेरे पास आया हूँ और तेरी खिचडी खा रहा हूँ।"

कर्मा ने देखा साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण जी बैठे उसकी खिचडी खा रहें हैं। वह बावली बनकर भगवान् की मधुर छवि एकटक देखती रही। कुछ क्षण पशचात कर्मा ने कहा-" भगवान्! सदा इसी प्रकार मेरी खिचडी का ही प्रथम भोग लगाया करो।"

 इतना कहकर कर्मा श्रीकृष्ण भगवान् कर चरणों में गिर पड़ी और सदा के लिए स्वर्गधाम चली गई। तभी से पुरी में श्रीजगादीश भगवान् को सर्वप्रथम, माँ कर्मा की खिचडी का ही भोग लगाने की परम्परा आज भी प्रचलित है और वहां पर भगवान् के दर्शन व प्रवेष सभी के लिए खुले हैं।

ताला TALA


छत्तीसगढ़ में अद्भुत शिव रूद्र प्रतिमा वाला पर्यटन स्थल - ताला

रायपुर से बिलासपुर राजमार्ग पर 85 किलोमीटर दूर है ग्राम ताला।
यहां अनूठी और अद्भुत मूर्तियां मिली है।
शैव संस्कृति के 2 मंदिर देवरानी-जेठानी के नाम से विखयात है।
          यहां ढाई मीटर ऊंची और 1 मीटर चौड़ी जीव-जंतुओं की मुखातियों से बने अंग-प्रत्यंगों वाली प्रतिमा मिली है, जिसे रूद्र शिव का नाम दिया गया है। महाकाल रूद्र शिव की प्रतिमा भारतीय कला में अपने ढंग की एकमात्र ज्ञात प्रतिमा है। कुछ विद्वान धारित बारह राशियों के आकार पर इसका नाम कालपुरूष भी मानते हैं।
        महाकाल रूद्रशिव की प्रतिमा भारी भरकम है। 2.54 मीटर ऊंची और 1 मीटर चौडी प्रतिमा के अंग-प्रत्यंग अलग-अलग जीव-जंतुओं की मुखाकृतियों से बने हैं, इस कारण प्रतिमा में रौद्र भाव साफ नजर आता है। प्रतिमा संपादस्थानक मुद्रा में है।

   इस महाकाय प्रतिमा के रूपांकन में गिरगिट, मछली, केकड़ा, मयूर, कछुआ, सिंह और मानव मुखों की मौलिक रूपाति का अद्भूत संयोजन है। मूर्ति के सिर पर मंडलाकार चक्रों में लिपटे 2 नाग पगडी के समान नजर आते हैं। नाक नीचे की ओर मुंह किए हुए गिरगिट से बनी है। गिरगिट के पिछले 2 पैरों ने भौहों का आकार लिया है। अगले 2 पैरों ने नासिका रंध्र की गोलाई बनाई है। गिरगिट का सिर नाक का अगला हिस्सा है। बडे आकार के मेंढक के खुले मुख से नेत्रपटल और बडे अण्डे से गोलक बने हैं। छोटे आकार की मछलियों से मुछें और निचला होंठ बना है। कान की जगह बैठे हुए मयूर स्थापित हैं। कंधा मगर के मुंह से बना है। भुजाएं हाथी के सूंड के समान हैं,हाथों की उंगलियों सांप के मुंह के आकार की है,दोनों वक्ष और उदर पर मानव मुखातियां बनी है। कछुए के पिछले हिस्से कटी और मुंह से शिश्न बना है। उससे जुडे अगले दोनों पैरों से अण्डकोष बने हैं और उन पर घंटी के समान लटकते जोंक बनी है। दोनों जंघाओं पर हाथ जोडे विद्याधर और कमर के दोनों हिस्से में एक-एक गंधर्व की मुखाति बनी है। दोनों घुटनों पर सिंह की मुखाति है,मोटे-मोटे पैर हाथी के अगले पैर के समान है। प्रतिमा के दोनों कंधों के ऊपर 2 महानाग रक्षक की तरह फन फैलाए नजर आते हैं। प्रतिमा के दाएं हाथ में मोटे दंड का खंडित भाग बचा हुआ है। प्रतिमा के आभूषणों में हार, वक्षबंध, कंकण और कटिबंध नाग के कण्डलित भाग से अलंकृत है। सामान्य रूप से इस प्रतिमा में शैव मत, तंत्र और योग के सिद्धांतों का प्रभाव और समन्वय दिखाई पडता है।

 पर्यटन विकास में सरकारी योगदान - बिलासपुर जिले में पर्यटन की दृष्टि से देखे तो सर्वप्रथम ताला पर ध्यान जाता है। रूद्र शिव प्रतिमा, देवरानी जेठानी मंदिर के इस प्रसिध्द पुरातात्विक स्थल के विकास के लिए विभिन्न योजनाओं को सरकार द्वारा मंजूर दी गई है। सड़क पेयजल एवं छाया दार स्थलों का निर्माण, आसपास के स्थल पर आकर्षक उद्यान, फव्वारे, समीप ही बहने वाली मनियारी नदी पर एनीकट बनाकर पानी को रोकने और उसमें नौकायन की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। सिंचाई विभाग द्वारा 30 लाख की लागत से उद्यान तथा एक करोड की लागत से मनियारी नदी के दोनों ओर 150-150 मीटर घाट निर्माण हेतु एक करोड व्यय किये गये है। तथा 117 लाख की लागत से मनियारी नदी पर ताला एनीकट बनाया गया। आसपास के मंदिरों के जीर्णोद्वार के कार्य किये गये है। ताला पहुंच मार्ग के दोनों ओर वृक्षारोपण कर हरियाली लाने का प्रयास किया गया है। ताला से कुछ दूरी पर प्रसिध्द ऐतिहासिक स्थल मदकुद्वीप स्थित है। जहां प्रतिवर्ष मसीही मेला का आयोजन किया जाता है। द्वीप तीन ओर से शिवनाथ नदी और मनियारी नदी के संगम से घिरा हुआ है। वन विभाग द्वारा द्वीप में स्थित प्राचीनतम शिव मंदिरों का जीर्णोद्वार कराया गया है। विश्राम गृह का निर्माण तथा हरियाली के लिए वृक्षारोपण किये गये है। द्वीप के चारों ओर एक करोड की लागत से पीचिंग कर नदी के कटाव को रोका गया। द्वीप के समीप शिवनाथ नदी पर 15 करोड की लागत से एनीकट का निर्माण प्रगति पर है। साथ ही नदी के दोनों ओर 50-50 मीटर तक घाट निर्माण किया गया है।

कबीर के दोहे KABEER KE DOHE


कबीर के दोहे 

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय॥1॥

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर॥2॥

तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय।
कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय॥3॥

गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय॥4॥

सुख मे सुमिरन ना किया, दु:ख में करते याद।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद॥5॥

साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय॥6॥

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय॥7॥


कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर॥8॥

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर॥9॥

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय।
हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय॥10॥

दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय॥11॥

बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर॥12॥

साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय॥13॥

साँई इतना दीजिए जामें कुटुंब समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भुखा जाय॥14॥

जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥15॥


उठा बगुला प्रेम का तिनका चढ़ा अकास।
तिनका तिनके से मिला तिन का तिन के पास॥16॥

सात समंदर की मसि करौं लेखनि सब बनराइ।
धरती सब कागद करौं हरि गुण लिखा न जाइ॥17॥

साधू गाँठ न बाँधई उदर समाता लेय।
आगे पाछे हरी खड़े जब माँगे तब देय॥18॥

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय॥19॥

कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर॥20॥

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर॥21॥

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय।
हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय॥22॥

जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय।
जैसा पानी पीजिये, तैसी बानी सोय॥23॥


जो तोको काँटा बुवै, ताहि बुवै तू फूल।
तोहि फूल को फूल है,वाको है तिरशूल॥24॥

मूरख को समुझावते, ज्ञान गाँठि का जाय।
कोयला होय न ऊजला, सौ मन साबुन लाय॥25॥

शब्द सम्हारे बोलिये,शब्द के हाँथ न पाँव।
एक शब्द औषधि करे, एक शब्द करे घाव॥26॥

साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय॥27॥

साँई इतना दीजिए जामें कुटुंब समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भुखा जाय॥28॥

चौदह सौ पचपन गये, चंद्रवार, एक ठाट ठये।
जेठ सुदी बरसायत को पूनरमासी प्रकट भये॥29॥

बुरा जो देखन मैं चल्या, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय॥30॥

कथनी कथी तो क्या भया जो करनी ना ठहराइ।
कालबूत के कोट ज्यूं देखत ही ढहि जाइ॥31॥


दोष पराए देख कर चल्या हंसत हंसत।
अपनै चीति न आबई जाको आदि न अंत॥32॥

कबीरा खड़ा बजार में, सब की चाहे खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर॥33॥

सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदय सांच हें, वाके हिरदय आप॥34॥

एकै साध सब सधै, सब साधे सब जाय।
जो तू सींचे मूल को, फूले फल अघाय॥35॥

काल करै सो आज कर, आज करै सो अब।
पल में प्रलय होयगी, बहुरि करोगे कब॥36॥

सूरा के मैदान में, कायर का क्या काम।
कायर भागे पीठ दे , सूरा करे संग्राम॥37॥

सतनाम जाने बिना, हंस लोक नहिं जाए।
ज्ञानी पंडित सूरमा, कर कर मुये उपाय॥38॥

सुमिरन करहु राम का, काल गहै है केस।
न जानो कब मारिहै, का घर का परदेस॥39॥


करता था सो क्यों किया, अब करि क्यों पछताय।
बोवे पेड बबूल का, आम कहां से खाय॥40॥

जो जल बाढ़े नांव में, घर में बाढ़े दाम।
दोऊ हाथ उलीचिये, यही सयानो काम॥41॥

कबिरा गरब न कीजिये, कबहूं न हंसिये कोय।
अबहूं नाव समुंद्र में, का जाने का होय॥42॥

जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ।
मैं बौरी बन डरी, रही किनारे बैठ॥43॥

कर बहियां बल आपनी, छोड़ बीरानी आस।
जाके आंगन नदि बहे, सो कस मरत प्यास॥44॥

पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंड़ित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंड़ित होय॥45॥

चलती चक्की देखि कै, दिया कबीरा रोय।
दुइ पट भीतर आइ कै, साबित गया न कोय॥46॥

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥47॥


कबीरा सोई पीर हैं, जो जाने पर पीर।
जो पर पीर न जानई, सो काफिर बेपीर॥48॥

कबीर माला काठ की, कहि समझावै तोहि।
मन न फिरावै आपणा, कहा फिरावै मोहि॥49॥

कस्तूरी कुंजल बसे, मृग ढूढै बन माहि।
ऐसे घट घट राम हैं, दुनिया देखे नाहि॥50॥

चारिउं वेदि पठाहि, हरि सूं न लाया हेत।
बालि कबीरा ले गया, पंडित ढूंढे खेत॥51॥

ऊंचे कुल का जनमिया, जे करणी ऊंच होइ।
सुबण कलस सुरा भरा, साधू निन्दै सोइ॥52॥

ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोइ।
आपन को सीतल करे, और हु सीतल होइ॥53॥

कबीर तूं काहै डरै, सिर पर हरि का हाथ।
हस्ती चढि नहि डोलिये, कुकर भूखें साथ॥54॥


माली आवत देख कै कलियन करी पुकार।
फूली फूली चुन लिए, काल्हि हमारी बार॥55॥

कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई बनाय।
ता चढि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय॥56॥

सहज सहज सब कोऊ कहै, सहज न चीन्है कोइ।
जिन्ह सहजैं विषया तजी, सहज कहीजै सोइ॥57॥

सुखिया सब संसार है खावै और सोवै।
दुखिया दास कबीर है जागै अरू रोवै॥58॥

कबीर घोड़ा प्रेम का, चेतनि चढ़ि असवार।
ग्यान षड्ग गहि, काल सिरि, भली मचाई मार॥59॥

माया मुई न मन मुवा मरि मरि गया सरीर।
आशा त्रिष्णा ना मुई, यौ कह गया कबीर॥60॥

मन माया तो एक हैं, माया नहीं समाय।
तीन लोक संसय परा, काहि कहूं समझाय॥61॥

रज गुन ब्रह्मा तम गुन संकर सत्त गुन हरि सोई।
कहै कबीर राम रमि रहिये हिन्दू तुरक न कोई॥62॥

एक राम दशरथ का प्यारा, एक राम का सकल पसारा।
एक राम घट घट में छा रहा, एक राम दुनिया से न्यारा॥63॥

लाली मेरे लाल की जित देखों तित लाल।
लाली देखन मैं चली, हो गई लाल गुलाल॥64॥

पूरब दिसा हरि को बासा, पश्चिम अलह मुकामा।
दिल महं खोजु, दिलहि में खोजो यही करीमा रामा॥65॥

Thursday, July 14, 2011

झाँसी की रानी

झाँसी की रानी



सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।


चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।


वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।


महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,


चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।


निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।


अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।


रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।


बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।


यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।


हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,


जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।


लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।


ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।


अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।


पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।


घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,


दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।


तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
"Subhadra Kumari Chauhan"
Shobind Sahu

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