Thursday, January 19, 2012

अवांछित बेटियां


अवांछित बेटियां

अपने गर्भ में आये विनष्ट मादा भ्रूणों की स्मृतियों को शाखा ने गुडियों के रूप में सहेज लिया था। जब घर में अंबर नहीं होता और वह अकेली होती तो छुपाकर रखी इन गुडियों को वह कबर्ड से निकालती, फिर उन्हें अपने सीने से चिपका कर मातृत्व की सरिता द्वारा सींचने लग जाती। तीन बार गर्भपात की वह शिकार हुई थी, इसलिये तीन गुडियां थीं उसके पास। इनके नाम तक रखकर उसने क्रोशिये और धागे से लिख दिये थे उनकी कलाइयों पर। हर बार वह इनकी उम्र का हिसाब लगाती और एक अपराधबोध से भरकर विह्वल हो जाती, '' मुझे माफ कर देना मेरी बच्चियों! तुम सबको कोख में ही मार देने के जुल्म में पति और समाज के साथ मैं भी साझीदार  हूं। चाहती थी कि तुम सबकी और तुम्हारे जैसी अनेकों की मां बन कर मैं फलों से लदा एक विशाल छतनार पेड बन जाऊं। पति नामधारी पुरुष के बिना गर्भ धारण करना और फिर भरण - पोषण करना संभव होता और उसमें समाज का कोई दखल नहीं होता तो मैं अपनी दसों इन्द्रियों की कसम खाकर कहती हूं, मेरी अजन्मी पुत्रियों, मैं अभी से सिर्फ और सिर्फ लडक़ियों को जन्म देती,  जिनकी संख्या कम से कम दो दर्जन होती बल्कि इससे भी ज्यादा कर पाती तो मुझे और मजा आता।''

शाखा जब कॉलेज में पढती थी तब से ही सहेलियों से अपने मनोभावों को शेयर करती हुई यह इच्छा जताती थी कि वह बहुत सारी लडक़ियों की मां बनना चाहती है।  सहेलियां उसका तेवर जानतीं थीं और यह समझती थीं कि ऐसा कह कर दरअसल वह अपने भीतर के एक विरोध को मुखर कर रही है। उसके परिवार में कई बाल - बच्चेदार दम्पत्ति थे, बडे भाइयों और चाचाओं के,  लेकिन सबने बडी चालाकी से सिर्फ नर शिशुओं को जन्म दिया था। सिर्फ एक उनके पिता थे, जिन्होंने कोई चालाकी नहीं की थी, इसलिये उन्हें चार बेटियां ही थीं और इसके लिये वे एक हीनभावना से हमेशा ग्रसित रहा करते थे। घर के दूसरे लोग भी इस मामले को लेकर उनके प्रति उपेक्षा - भाव रखते थे। शाखा को इन स्थितियों से सख्त ऐतराज था और इस ऐतराज की प्रतिक्रिया में वह दर्जनों बेटियों की मां बनना चाहती थी। मगर विवाह के तुरन्त बाद ही उसे पता चल गया कि वह महज उसकी एक अपरिपक्व सोच एवं भावुकता थी।

जब पहला ही गर्भ ठहरा तो अम्बर ने भ्रूण परीक्षण के लिये उसे तैयार होने को कहा, '' शाखा मुझे लडक़ी नहीं चाहिये। तुम अपनी आंखों से देख चुकी हो कि छोटी बहन की शादी ने मुझे कितनी जिल्लत दी और किस कदर दिवालिया बना दिया। आज भी उसकी ससुराल के कुत्ते मेरे जिस्म को नोंच रहे हैं, जैसे मैं उनका जन्मजात
कर्जदार हूं। अब और साहस नहीं है कि बेटी ब्याहने के नाम पर कोई दोबारा मेरी खाल उतार ले। मामूली सी नौकरी है, जिसके जरिये अपने लिये भी चन्द हसरतें और चंद सपने पूरे करने हैं, अन्यथा यह जिन्दगी दहेज जमा करने में ही स्वाहा हो जायेगी।''

शाखा को एकबारगी लगा था कि अंबर के उठाए मुद्दे को वह बेजा नहीं ठहरा सकती। यह सच है कि परिधि के विवाह में उसने क्या कुछ नहीं सहा। चार साल तक पागलों की तरह भटकने के बाद थक - हारकर उसे अपनी हैसियत से बाहर जाकर एक बडी दहेज राशि पर एक रिश्ता तय करना पडा। क्लर्क से रिटायर हुए पिता की सारी जमापूंजी, छह सात साल की अपनी नौकरी में काट - कपटकर की गयी बचत और ऊपर से हर मुमकिन कर्ज लेकर जो कुल जमा हुआ, वह अब भी काफी कम था उस दाम से जो लडक़े के बाप ने अपने बेटे के लिये लगाया था। अपनी बहन परिधि को अंबर बहुत प्यार करता था। वह एक अच्छे घर में जाकर सुख से रहे, यह उसकी दिली ख्वाहिश थी। लडक़े के पिता के सामने जाकर उसने हाथ जोड दिये, '' खुद को पूरी तरह निचोडक़र भी मैं इतना रस नहीं निकाल सका कि आपके इच्छा - पात्र को भर सकूं। मुझ पर कृपा कर के थोडी सी रियायत''

जैसे उसके उबल पडने का कोई स्विच ऑन हो गया हो, वह फनफना उठा -
 '' तो तुम भाड में जाओ, मेरा घर कोई राहत केन्द्र नहीं है। कई लोग पहले ही क्यू में हैं, तुम अपनी बराबरी की कोई दूसरी जगह ढूंढ लो।''
 ऐसा बेमुरव्वत सलूक तो कोई सूदखोर महाजन भी नहीं करता होगा। उसने समझ लिया कि बेहतर है यहां से जाकर किसी कसाई से अनुरोध किया जाय। इस घर में परिधि कभी सुखी नहीं रह सकती।

उसने दूसरे घर - वर की तलाश शुरु कर दी इसमें दो वर्ष और लग गये। धैर्य की ऐसी सख्त परीक्षा शायद इस दुनिया में अन्य किसी भी चीज क़े ढूंढने में नहीं हो सकती। एक बार तो उसे ऐसा भी लगा कि इस परीक्षा में बार बार फेल हो जाना ही उसकी नियति है। परिधि के लिये लडक़ा ढूंढना उससे शायद संभव नहीं।

उसके एक रिश्तेदार ने सलाह दी, '' अगर ऊंची रकम देने की सामर्थ्य नहीं है तो पसंद - चयन की कसौटी को जरा लचीला कर लेना चाहिये।''

अन्तत: उसने ऐसा ही किया। अपनी रूपवती - गुणवती बहन के लिये उसे एक डेढ आंख वाले थुथुरमुंहे लडक़े को पसन्द करना पडा। यहां नगद उतना ही मांगा गया, जितना वह दे सकता था। खुद को यह समझाकर शादी कर दी कि चेहरे की स्थूल सुन्दरता से कहीं बडी होती है आंतरिक सुन्दरता। मगर यहां आलम यह था कि कोई सी भी सुन्दरता नहीं थी। शादी के बाद परिधि को मंहगे घरेलू उपकरण मांग लाने के लिये परेशान किया जाने लगा। अंबर एक की पूर्ति करता तब तक दूसरी मांग फिर उग आती।  तात्पर्य यह कि परिधि की जान प्रताडना और थूकम - फजीहत की सांसत में जाकर फंस गयी। अंबर से आये दिन थुथुरमुंहा और उसके परिवार की रार - तकरार मचने लगी।

यह परिस्थिति आज भी जारी है, ऐसे में अगर वह बेटी के बाप होने को अभिसाप मानकर इससे बचने के लिये सख्त एहतियात बरतना चाहता है तो शाखा इस मानसिकता को समझ सकती है। उसने उसकी मन:स्थिति से सहमति व्यक्त करते हुए कहा, '' मैं तुम्हारी पीडा से अलग नहीं हूं अम्बर। दहेज के दानवी चेहरों ने हजारों - लाखों घर उजाडे हैं और बेशुमार जिन्दगियां तबाह की हैं लडक़ियां फिर भी जन्म लेती रही हैं और दुनिया को अगर रुक नहीं जाना है तो जन्म लेती ही रहेंगी।  तुम्हारी तो एक ही बहन थी, मेरे पिता ने तो चार बेटियों को ब्याहा है। उनके एक जमाई तुम भी हो, तुमने तो उनसे कभी कुछ लेने में रुचि नहीं दिखाई। तो लोग तुम्हारी तरह भी हैं दुनिया में। मेरी यह पहली प्रेगनेन्सी है, इसे प्लीज र्निद्वन्द्वता से सम्पन्न होने दो। पहले इशू में कोई वर्जना, कोई रुकावट, कोई संशय उचित नहीं। अगर बेती भी होती है तो हमें उसे स्वीकार करना है। आखिर बेटी के रूप में कम से कम एक संतान घर में जरूरी भी है और उसकी परवरिश हमारा दायित्व भी है।''

अंबर ने कोई जिरह नहीं की। शाखा तनिक अचम्भित रह गई इतनी आसानी से वह मान जायेगा, सोचा नहीं था। कुछ पल चिंतामग्न रहने के बाद कहा उसने, '' एक बेटी घर के लिये कितनी अहम् होती है, यह मुझसे ज्यादा कौन जान सकता है शाखा? जब मेरी मां चल बसी थी तो बहुत छोटी होकर भी परिधि ने ही पूरे घर को संभाला था। मैं उससे कई साल बडा था, लेकिन घर को संवारने - संभालने और रसोई सीधी करने के मामले में मैं किसी काम का नहीं था। दमा और हृदय रोग के मरीज बाऊजी को परिधि ने अपनी सुश्रुषा से हमेशा संतुष्ट रखा। वे कहते थे मुझे, '' अपनी परिधि की सुघडता देखो, अंबर। इसने घुट्टी में ही कब सीख लिया यह सब, हमें पता ही नहीं चला। ऐसी ही बेटियां घर की लक्ष्मी कही जाती हैं। इसके मनोहारी बर्ताव, सम्बोधन और बोल घर को स्वर्ग का आभास दिलाने लगते हैं। मैं न भी रहूं तो इसका ब्याह खूब अच्छी जगह करना बेटे।'' कहकर एक दीर्घ नि:श्वास भरी अम्बर ने।

'' बाऊजी सचमुच उसके ब्याह के लिये नहीं रहे और मैं ऐसा नालायक साबित हुआ कि चाह कर भी परिधि के लिये मनोनुकूल घर - वर नहीं ढूंढ सका। बेचारी हमेशा दबी - घुटी - सहमी और उदास रहती है।'' एक मायूसी उतर आई अम्बर के चेहरे पर, '' परिधि की हालत देखता हूं तो घर में दूसरी बेटी की उपस्थिति की कल्पना मात्र से हृदय थर्रा जाता है। लेकिन तुम चाहती हो कि मातृत्व के तुम्हारे पहले अवसर को स्वछंद रहने दिया जाये तो चलो मैं तुम्हारी भावना को आहत नहीं करता,  मगर इसके साथ ही यह आश्वासन भी चाहता हूं कि अगली बार तुम फिर मेरे सामने ऐसे सवाल उठा कर मेरी परीक्षा नहीं लोगी।''

शाखा ने हंसी में अनुराग घोलते हुए कहा, '' अगर बेटा हो गया इस बार तो अगली बार भी मेरा यह सवाल कायम रहेगा ।''
 '' चलो मान लिया।'' अंबर भी हंस दिया, स्निग्ध और समर्पण की हंसी।
पति - पत्नी के बीच यह दिल्लगी भरा मुंहजवानी करार हो गया।

शाखा ने बालिका शिशु को जन्म दिया, आशंका ऐसी ही थी, हालांकि दोनों ने मन ही मन पुत्र प्राप्ति की घनघोर कामना की थी। नियति प्राय: ऐसा ही विधान रचती है, जिससे आप भागना चाहते हैं,  वह आपके पीछे लग जाती है।

मुन्नी घर में पलने लगी, लाड - प्यार के सहज और स्वाभाविक परिवेश में पलने लगी। बिना किसी ग्रन्थि के। बर्ताव में ऐसी शालीनता की सीमा बस यहीं तक रही। अगले इशू से उनकी प्राथमिकता बदल गई।

दूसरे, तीसरे और चौथे गर्भ का हश्र गुडियों में परिवर्तित हो गया। हर बार शाखा का शरीर ही नहीं अंतस भी लहूलुहान हुआ। वह सोचती थी कि एक देवकी थी जिसके जन्मे बच्चे को उसका भाई कंस नष्ट कर देता था, एक वह है जिसके बिनजन्मे बच्चे को ही उसका पति नष्ट करवा देता है। कंस को अपनी मृत्यु का भय और उसके पति कोधन और मान की हानि का भय है। देवकी को बचाने के लिये कई शक्तियां थीं, मगर वह स्वयं अपने आपको भी बचाने का उपक्रम नहीं करती। कंस क्रूर और बर्बर था, जबकि उसका पति उदार और भावुक है।

शाखा के मन में आता कि जब गर्भपात ही उसकी नियति है तो फिर वह गर्भ धारण ही क्यों करे? क्यों नहीं ऑपरेशन करवा कर इस झंझट से ही मुक्त हो जाये। संतान के नाम पर मुन्नी तो है ही। बेटा नहीं हो रहा तो न हो ज़रूरी भी क्या है? लेकिन अगले ही पल वह इस सच्चाई की पकड में आ जाती कि ऐसे निर्णय लेने को भी क्या वह स्वतन्त्र है?  मतलब एक औरत न तो अपनी मरजी से मां बन सकती है और न मां बनने से इंकार कर सकती है। अपनी कोख तक पर उसे अधिकार नहीं। अधिकार की बात वह करे भी तो कैसे, आखिर अंबर उसे प्यार भी तो कम नहीं करता। प्यार के नाम पर भी कभी - कभी कितना कुछ बर्दाश्त करना होता है।

अंबर ने कहा, '' यह हमारी आखिरी कोशिश होगी और तुम्हारी आीखरी तकलीफ। बहुत ज्यादती सह ली तुमने। अगर बेटा रह गया तो ठीक है, वरना इससे छुट्टी पाकर बस मुन्नी से ही हमें सब्र कर लेना है।''

शाखा को लगा कि दोनों के मन के बीच जैसे कोई टेलीपैथी हो गयी। यही तो वह भी चाहती है। अब भला ऐसे आत्मीय और मीठे संभाषण करने वाले पति को कोई खलनायक कैसे करार दे? क्या प्यार और विश्वास भी खलनायकी का अस्त्र हो सकता है? उसके मन ने कहा,  शायद हां और शायद ज्यादा खतरनाक एवं अचूक भी।

डॉक्टर के पास गये वे लोग। उसकी जानकारी में शहर में एक ही डॉक्टर था जो यह काम करता था। इस काम के लिये डॉक्टर ऊंची फीस लेता था। गर्भ परीक्षण करके गर्भाशय की धुलाई भी उसके जिम्मे होती थी।  परीक्षण पर वैधानिक प्रतिबंध लगने के बाद डॉक्टर ने यों यह धंधा बन्द कर दिया था, फिर भी कुछ खास परिस्थितियां और कुछ खास लोग नियम - कानून के दायरे से हमेशा, कई जगह, कई बार बाहर तो होते ही हैं। डॉक्टर से बहुत नजदीकी से जान पहचान हो जाने बाद अंबर भी खुद को इसी खास श्रेणी में मानता था।

डॉक्टर से अंबर ने कहा, '' अंतिम बार आपको कष्ट देने आया हूं। इस बार अगर नर भ्रूण न रहा तो धुलाई करके बंध्याकरण का ऑपरेशन कर दीजिए।''

डॉक्टर ने बहुत देर तक अंबर और शाखा की आंखों में झांक कर देखा और कहा, '' इस बार तुम्हें निराश होना पडेग़ा भाई। मैं ने यह काम पूरी तरह बन्द कर दिया है। दुनिया को असंतुलित करने का अपराध अब और मुझसे नहीं होगा।''
 '' डॉक्टर आप जानते हैं कि किसी भी शर्त पर मुझे यह काम करना है। यहां नहीं तो कहीं और जाना होगा, कहीं और भटकना होगा तथा मुझे ज्यादा पैसे खर्च करने होंगे, ज्यादा परेशान होना पडेग़ा। ऐसा अन्याय आप हम पर क्यों करेंगे?''
 '' मतलब समाज और कानून तुम्हारे लिये कोई मायने नहीं रखते?''
 '' बहुत मायने रखते हैं मैं पहले भी कह चुका  हूं यह समाज और कानून आखिर क्यों यह व्यवस्था नहीं करता कि लडक़ियों के प्रति भेदभाव न हो और उनकी शादी में फकीर और दीवालिया होने की नौबत न आये। अगर ऐसा हो जाये तो मेरा दावा है कि लडक़ियों के जन्म को सर्वत्र प्राथमिकता मिलने लगेगी। चूंकि यह सभी जानते हैं कि बेटियों से न सिर्फ दुनिया आगे चलती है, बल्कि खूबसूरत भी बनती है। मां - बाप को सहारा और सम्मान देने के मामले में लडक़ियों का बर्ताव असंदिग्ध रूप से विश्वसनीय होता है।''

डॉक्टर जानता था कि यह आदमी माननेवाला नहीं है अपनी बहन की शादी में जो दंश झेल चुका है, उसे भूल नहीं सकता। एक बार तो वह परिधि को भी लेकर आ गया था। परिधि ने अपने भाई का समर्थन करते हुए कहा था , '' भैया ठीक कहते हैं, डॉक्टर! बेटी वही पैदा करे जिसके घर में लाखों - करोडाें जमा हों। मैं आज भी अपने घर में रौरव भोग रही हूं। यह जीवन ही मेरा मानो व्यर्थ होकर रह गया। मेरे बाद एक और लडक़ी इस घर में आ चुकी है, अब दूसरी भी अगर आ गयी तो भैया खुद को बेचकर भी कोई उपाय नहीं कर पायेंगे।''

डॉक्टर ने अपने मन में एक निश्चय किया और फिर शाखा का अल्ट्रासाउण्ड करके खुशखबरी देने के अन्दाज में बताया, '' अरे! यह तो चमत्कार हो गया। इस बार भ्रूण मादा नहीं नर है। मुबारक हो, बेटे का बाप बनोगे तुम।''
ठगा सा रह गया अंबर। शाखा को भी अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। डॉक्टर मजाक तो नहीं कर रहा। लेकिन डॉक्टर की भंगिमा मजाक की कतई नहीं थी।

छह महीने तक उन्हें इंतजार करना था  किया। इस दौरान कई सपने, हसरतें सजाते रहे।  खुशियां कई शक्लें अख्तियार कर उनके भीतर हिलोरें लेती रही। वे बेटे को पालने, पढाने और ब्याहने तक की मानसिक रूपरेखा तैयार करते रहे।

इंतजार की बहुप्रतीक्षित घडी ख़त्म हुई और शाखा का प्रसव सम्पन्न हो गया। जन्म लेने वाला शिशु बालक नहीं बालिका थी। अंबर को लगा जैसे आसमान से चारों खाने चित्त गिर गया हो धरती पर। डॉक्टर ने झूठ कह कर उसके साथ छल किया। क्यों किया उसने ऐसा? इस झूठ की उसे कितनी बडी क़ीमत चुकानी होगी, बार - बार बताने पर भी उसने समझने की कोशिश नहीं की। उसकी भावनाओं के साथ खिलवाड क़िया। मुन्नी के लिये अभी से ही उसे एक चौथाई तनख्वाह की सेविंग करनी पड रही थी, फलस्वरूप वह स्थायी तौर पर तंगी और अभाव का शिकार था। एक और के लिये भी अगर ऐसी व्यवस्था करनी पडे तो फिर महीने दस दिन उपवास में ही गुजारने होंगे। अंबर आपे से बाहर हो गया और चट्टान जैसी कठोरता उसके चेहरे पर उतर आयी। नवजात शिशु को लेकर वह डॉक्टर के पास चला गया।
 '' डॉक्टर'' जैसे दहाड उठा अम्बर, '' तूने मेरे साथ बहुत भद्दा और बेहूदा मजाक किया है, मैं इसके लिये तुम्हें कभी माफ नहीं कर सकता।  तुम्हें इसकी सजा भोगनी होगी।''

डॉक्टर स्तब्ध रह गया, हमेशा शिष्ट और शालीन आचरण करने वाला व्यक्ति क्या इतना प्रचण्ड रूप धारण कर सकता है?
 '' तुमने झूठ बता कर मेरी आधी अधूरी खुशियों पर कहर बरपा दिया है। गर्भ में जिसे तुमने लडक़ा बताया वह लडक़ी थी। इसके पैदा होने के जिम्मेदार तुम हो, इसलिये इसे मैं तुम्हारे पास छोडने आया हूं। अगर तुमने इसे लेने से इंकार कर दिया तो मेरे पास इसे सिवा मृत्यु देने के कोई और उपाय नहीं । चूंकी मेरी ओर से इसे मृत्यु मिलन िथी, वह अगर तीन महीने की भ्रूणावस्था में नहीं मिली तो अब मिल जायेगी और इसकी जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ तुम पर होगी।''
डॉक्टर की जिह्वा तालू से चिपक गयी थी अपने नवजात शिशु के प्रति एक पिता क्या इतना असहिष्णु और निर्मम हो सकता है? पितृत्व की गोद अगर कांटेदार हो गयी थी तो क्या मातृत्व के स्तन का दूध भी सूख गया? शाखा ने जुल्म ढाने के लिये इस दुधमुंही को इसके हवाले कैसे कर दिया? क्या व्यवस्था वाकई इतना सड - ग़ल गयी है कि मातृत्व और पितृत्व जैसे मूल्य बेमानी हो गये हैं? एक बच्चा जो दुनिया में आता है, पूरी तरह पराश्रित होता है, उसे आप फेंक दें,  काट दें, गाड दें इसका उसे कोई बोध नहीं होता।

लेकिन यह एक नैतिकता है, मनुष्य में नहीं जानवरों तक में कि वे अपने नवजात बच्चे के लिये अधिकतम उदार, शुभेच्छु और पालनहार होते हैं। आज एक मां बाप ही अपने बच्चे को मारने पर तुले हैं, महज इसलिये कि शिशु बालक नहीं बालिका है। तो यह दुनिया इतनी खराब और बुरी हो गयी?

डॉक्टर ने अत्यन्त दुखी होकर कहा, '' माना कि मुझसे गलती हो गयी, हालांकि हुई नहीं। गलती तो मैं पहले करता रहा, इस बार तो मैं ने पिछली गलतियों को सुधारने की कोशिश की है। खैरमैं ने चाहे जो भी किया मगर अब जो तुम करने जारहे हो वह इन्सानियत के नाम पर भयानक धब्बा होगा।''

'' बकवास मत करो डॉक्टर,  मैं तुमसे यहां कोई पाठ पढने नहीं आया हूं। मेरे लिये क्या अच्छा और क्या बुरा है,  इसका फैसला मुजे खुद करना है। तुम्हारे पास कई बार मैं ने अपना दुखडा रोया,  फिर भी तुमने ऐतबार नहीं किया। तुम अगर समझते हो कि मैं बहुत हिंस्त्र,  बर्बर और जालिम हूं तो यही सही। अब बताओ इस बच्ची को यहां छोडूं या ले जाकर कहीं दफन कर दूं?''

डॉक्टर एक गहरे अर्न्तद्वन्द्व में घिर गया। दो बित्ते के लाल टुड - टुड करते फूल जैसे मासूम कोमल जिस्म की दो छोटी - छोटी बेहद निरीह और पवित्र आंखें चारों ओर नाच रही थींकभी मुस्कुरा कर कभी रोकर। जैसे इस दुनिया में आने का उसे हर्ष भी हो रहा था शोक भी। डॉक्टर को लगा कि इस नन्हीं सी जान को जिन्दगी से बेदखल करना सरासर अन्याय होगा। भ्रूण की बात कुछ और होती है, मगर अब यह पूरी तरह प्राण धारण किया हुआ एक मानवीय शरीर है। अंबर के चेहरे पर जिस तरह खून और वहशीपन सवार है कि आज वह कुछ भी कर गुजरेगा। बहुत दूर तक न सोच कर फिलहाल इसे बचाने का उपक्रम करना जरूरी है।

उसने कहा, '' ठीक है, तुम्हें बेटी नहीं चाहिये न तो इस नन्हीं सी जान को मेरे पास छोड दो। लेकिन मेरी एक शर्त है - तुम्हारे घर में जो आठ वर्ष की हो चली पहली बेटी है, उसे भी मेरे सुपुर्द करना होगा। आखिर उसे भी रखने का तुम्हें हक क्या है और फिर उससे भी मुक्त होकर क्यों नहीं तुम जरा ठाट से बसर करो।''

कुछ पल के लिये अम्बर हतप्रभ रह गया। कोई भी जवाब देते न बना।
डॉक्टर ने फिर कहा, '' सोच में क्यों पड ग़ये, तुम्हें तो दोहरी खुशी होनी चाहिये। तुम एक से पिण्ड छुडाना चाहते थे, मैं दोनों से छुडवा रहा हूं।''
 '' ठीक है, मैं तैयार  हूं।'' उसका चेहरा तमतमा गया, ''  तुम्हें अगर मसीहा बनने का ज्यादा ही शौक है तो मुझे क्या आपत्ति! हालांकि तुम्हारी इस शर्त के पीछे का मकसद मैं समझ गया हूं। तुमने मेरी यह नस ठीक पकडी है कि मुन्नी को हमने आठ साल तक पाला है और उससे हठात् मोह झटक देना हमारे लिये आसान नहीं। लेकिन इस अवांछित नन्हीं के विवाह की पर्वतनुमा जिम्मेवारी से बचने के लिये मैं यह करने को भी तैयार हूं।''

नन्हीं को छोड क़र वह घर चला गया। शाखा को जल्दबाजी में सूचित कर दिया कि डॉक्टर नन्हीं के साथ मुन्नी की भी परवरिश का जिम्मा मांगता है। इसलिये मुन्नी को लेकर जा रहा हूं उसे सौंपने।

शाखा फटी आंखों से उसे देखती रह गई और अम्बर मुन्नी को लेकर यों चला गया जैसे वह घर की फालतू निष्प्राण वस्तु हो। घर में कोई सामान भी होता है तो उसका हट जाना एक खालीपन का आभास जगाता रहता
है । मुन्नी को तो आठ वर्ष तक अपने घनिष्ठ लाड प्यार के साये में कलेजे के टुकडे क़ी तरह रका था शाखा ने। वह प्रसूति अवस्था में पडी नन्हीं से बिछुडने के सदमे से उबर भी नहीं पायी थी कि एक और आघात पर्वत टूटने की तरह बरस पडा छाती पर। एक औरत की क्या इतनी ही औकात है कि जब चाहा उसकी कोख उजाड दी, जब चाहा उसकी गोद छीन ली?  गाय - बकरियों से भी गयी गुजरी हालत। इस विषय पर उससे मशविरा किया जाये, इस लायक भी उसे नहीं समझा गया?

शाखा अभी तक अपनी अजन्मी बेटियों के नाम की गुडिया सहेजती रही थी, अब उसे इसी श्रेणी में एक साथ दो जीवित आत्माओं की स्मृतियों को भी सहेजना पडेग़ा। वह जब इन गुडियों से आत्मालाप और कन्फेशन करती थी, मुन्नी भी इन्हें छूकर रोमांचित हो उठती थी। अब वह भी इनके साथ एक नयी गुडिया के रूप में शामिल हो जायेगी। शाखा की आंखें जार जार बहने लगीं जो आठ साल तक उसकी दिनचर्या की हर सांस में शरीक रही है, उसका बिछोह क्या सहा जा सकेगा? खासकर यह जानते हुए कि वह जीवित है और इसी शहर में है!

अंबर ने मुन्नी को बहला - फुसला कर डॉक्टर के पास छोड दिया और घर लौट आया। डॉक्टर उसकी मुद्रा देखता - पढता रहा, जो न सिर्फ आवेश भरी थी बल्कि उसमें व्याकुलता और हिचकिचाहट का भाव भी समाया था। वह मानसिक रूप से बिलकुल ही स्वस्थ नहीं लग रहा था।

How To Formet Computer


How to format windows xp using a Windows XP disc

Okay guys let’s learn how to format windows xp. But calm down and take your time. To learn how to format a computer is a matter of being patient! This is the best advice I can give you.
First you must put your Windows XP CD in the drive.
Then restart your computer.
When it says press any key to boot from cd, Press any key on the keyboard. I use the space bar, easy to get to. (If you can do this Go to step 6)
If it doesn’t ask you to  press any key to boot from cd then restart your computer again.
Go into the BIOS settings of your PC, usually by pressing the F1, F2, F10, or maybe the delete key. If you are not sure watch the screen at startup and it will say “To enter setup press…….”. You have to be quick and press it. If you miss it restart again. Once you are in the bios you have to change the boot options. You have to make your cd rom the first boot option. Save and exit. If you do not understand how to get into your BIOS please see how to get into your BIOS and change settings.
When the CD starts up A blue screen will appear and you are on your way..


Press Enter to setup Windows XP now. See screen shot above. Do not rush through this process as pressing the wrong key here can take you down the wrong road. You should take your time when its your first time learning how to format a computer using windows xp.
If there is a copy of Windows XP on your computer and you wish to overwrite it you will have to press the escape button when prompted. (screen shot below) Do not install Windows XP in another directory unless you know what you are doing. Just overwrite the previous version as you should have backed up your files anyway. In this example I am showing you how to format a computer that has already had Windows installed on it.


You should now make the partition that had windows on it blue and press D to delete the partition. It will ask if you are sure. Press L to confirm. More details on deleting partitions.
Then Press C to create another partition and Windows will estimate a size for you. If you wanted to partition your hard drive into two equal parts you would have to do some math’s and then type the appropriate number in. Otherwise just going with what Windows puts there will be the minimum partition size. If you make a mistake when estimating the size of a partition you can simply go back now and delete the partition and start again. Do not move forward if you have made a mistake.
Press Enter to confirm size.
Then it will ask you which partition you want to install Windows on. The default is C: drive. Select this by making it blue and press enter.
If there are no partitions it will create one for you.
Then it will ask you to format quick, normal, in fat32 or NTFS. Fat32 suits older computers so I choose a quick format with NTFS. Quick or Slow is fine. If you had errors it is better to use a slow format which can also be known as a low level format. When you format a computer please note that a low level format can take a long time, depending on what size hard drive you have.
From now on you just Follow the prompts and let it go..the process of formatting your computer is on its way. Some setup files will be taken from the Windows CD onto your computer to complete this process.
The computer will restart and it will try to boot from cd again…Do not press anything on the keyboard.. Just let it go through the stages of setup. You only press the ANY KEY at the start to get it to boot to the Windows XP cd.
Make sure you have your serial number ready to enter in. This can be found on your coa sticker which is a sticker usually put on the side of your computer.
Do not remove the Windows XP CD until the computer has started up with a new desktop and icons.

Now the next process begins.. Installing your device drivers for your computer. See What are Device Drivers and why do I need them for my computer?

Thursday, October 27, 2011

15 माइल्स... द माइलस्टोन


15 माइल्स...द माइलस्टोन
हिमालयी संगीत की खनकती धुन...
समूची बस पर सवार है यह लहराती धुन...
सवारियों के दिलों में...
आंखों में...
सरगोशियों में...
एक युगल स्वर को खामोशियों में गूँजाती हुई धुन-
‘‘हर सुबह तुमसे जन्म लेते हैं, हर शाम तुम में खो जाते हैं...
तुम जगाते हो तो जगते हैं, तुम सुलाते हो तो सो जाते हैं...
‘‘इन शब्दों में सबको अपना-अपना मंतव्य और गंतव्य मिल जाता है।
               यह नृत्यों और गीतों की घाटी है...
 सीढ़ीदार खेतों और बागों में उगी उमंगों की आहट बचाती घाटी! संगीत और शब्द बस में तो नाच ही रहे हैं...
मानो इंजन और टायरों में जा कर भी सांस लेने लगे हैं।
बगल में नदी और चहुंओर कुदरत के खुले नजारे!
हर मोड़ जीवन जगाता एक जादू...
एक लंबी और चुस्त लड़की खड़ी है सामने मोड़ पर...
जिंदगी भी और जादू भी...
यकीनन!
लड़की के हल्के से संकेत पर बस ठहर जाती है...
सबकी नज़रें उस लड़की के लिए स्वागत से भर गई हैं...
उसे नदी की ओर खिड़की वाली सीट मिल गई है।
किसी को कोई जल्दी नहीं है। इस घाटी में फुर्सतें अभी बरकरार हैं। सड़क पर पहुंचते ही कोई न कोई बस आसानी से मिल जाती है...
जरा सा हाथ हिलाया नहीं कि बस ठिठक कर खड़ी हो जाती है। ड्राइवर और कंडक्टर जानते हैं कि सामने जो हाथ हिलता है, उससे रोजगार चलता है और नई-नई सवारियों से पहलू बदलता एक विस्मय संसार भी...
बस में लिखा भी है -
 अपनी सवारी जान से प्यारी!
 , लड़की! तुमने पढ़ा क्या? पता नहीं हिंदी जानती भी हो कि नहीं? पूरी एलियन लग रही हो...
पीठ पर बैग लटकाए...
दूर देश की गोरी छोरी! और...बजते हुए गीत का दृश्य हो गई हो। सो स्वीट एंड सो ग्लैमरस! यह लो... प्रायवेट और लोकल बस का युवा ड्राइवर स्मार्ट हो गया...
उसने उसके गाल में पड़ते टोये...
यानी दिपदिपाते डिंपल देखते ही पंजाबी गाना चालू कर दिया-गाला गोरियां ते विच टोये...
असी मर गए...
ओये-होये!...
कुड़ी कढ के कालजा लै गई...
सामने बैठी एक स्त्री मन ही मन कह रही है- पता नहीं कलेजा ले गई कि पूरा कॉलेज ही ले गई?
पंजाबी विच हर गल दे दो मतलब! ठीक है...
तुसी मर ही जाओ...
ओए होय... तुहाडा बेड़ा गर्क होय!
सानूं थल्ले ल्हा देओ ते तुसी जाओ ऊपर!
अपनी सवारी जान से प्यारीके मतलब और भाव बदल गए...
कुछ नजरें हट ही नहीं रहीं।
लेकिन वह लड़की तो कहीं और है...
उसकी गहरी और खोई-खोई आंखें उसकी बेखयाली को गा रही हैं। पीछे बैठे दो लड़के अपनी जुबान एक-दूसरे के कान से सटाए हुए हैं- ‘‘हर बार अचानक नए मोड़ पर आ जाती है... नए भेस में... इसका पता लगाना पड़ेगा। ‘‘
 हां... सिर्फ अपना पता भूल कर!
 अंतःपुर में बजने वाले नूपुर हर किसी के पल्ले पड़ते भी नहीं। घर बैठे धूप तापना कितना आसान है! सूरज और किरण को किसने छुआ है?

 आज धूप वाला दिन है...
 पहाड़ पर दिसंबर में पहली बर्फ के बाद की धूप... यानी अघोषित उत्सव! लोग घरों से बाहर उमड़ पड़ते हैं... रंगबिरंगे कपड़े पहने... औरतें अपने दरवाजों पर अनाज बीनती, लकड़ियां और घास सहेजती या सब्जी काटती आसानी से दिखाई दे जाती हैं। कई दिनों के बाद नीले आसमान के नीचे धुलने वाले कपड़े सूखने को टंगे हैं- मीठी धूप को हौले-हौले पीते हुए... एक बिल्कुल नए समय में... नया सूरज तापते...
 उसे यह घुमावदार सड़क अच्छी लगती है, इसलिए वह अक्सर कुछ बसों को छोड़ भी देती है और नदी के किनारे-किनारे काफी आगे तक पैदल निकल जाती है। नदी पार देवदारों के झुंड उसे हर बार नया रूप पहने खड़े मिलते हैं। इस बार भी वह नदी के इन तटों को जी भर कर देखने के बाद बस में चढ़ी है। खिड़की के बाहर बर्फ से लदे पहाड़...उनके बीच हरियाली और पतझर के नजारे... पाइन्स प्रजातियों को छोड़ कर हर कहीं ठंड से झुलसे पेड़...पीले पत्ते... सर्दी में दुबली हो जाने वाली नदी के आर-पार और बीच में उभर आई दूधिया चट्टानें... गोल-मटोल मटमैले और संगमरमरी पत्थर...
 बंधनमुक्त होने का अहसास उसे आज कुछ अधिक है...
 उसे ब्यास नदी का पौराणिक नाम याद आता है-विपाशा ! तटों के बंधों में भी पाशमुक्त है नदी...क्योंकि उसमें प्रवाह है...वह किसी की कुछ नहीं लगती, इसीलिए सबकी है...हर अंजुरी को उसने अपनी रवानी से पानी दिया है और हर घटना से विरक्त-मुक्त हो आगे निकल गई है।
 उसे दो अनोखे शख्स शिद्दत से याद हो आए, जिनके प्रेम से वह जन्मी थी... जिनकी घुमक्कड़ी के दरम्यान उसे हिमालय में एक गुमशुदा सी जिंदगी मिली... जो उसे दूर-दूर छिपाते बरसों अपने पिछले रिश्ते-नातों में आते-जाते रहे... जिन्होंने उसे सिखाया कि सच्ची जिंदगी की रचना स्वयं करनी होती है... झूठों से बनने वाली संगठित दुनिया में... अक्सर अपने वजूद को छिपा-छिपा कर... नए-नए लिबास देकर... अपने सच की हिफाजत के लिए दुनियावी झूठों के औजार लेकर...
 एक दूधिया नाले के पुल से बस गुजरी... लंबे मोड़ पर मुड़ी... और उसके चेहरे पर धूप आ पड़ी... आज फिर वह अपनी रूहपसंद जगह पर पहुँचेगी और वहां अपने और इस मौसम के कुछ और रूपरंग देखेगी... पता नहीं क्या-क्या?
 आकस्मिक और मारक हैरानियां उसकी जिंदगी हैं...

 अनंतकाल तक बार-बार इन वादियों में आना है मुझे... यह सब मुझमें है... मुझसे है... यह सब इसलिए है कि मैं इस सबमें अपने खोए हुए खुद को खोज सकूं... हर चीज पर शंका और प्रश्न कर सकूं... यह भी कह बैठूं कि सिद्ध करो कि यह संसार सच में है... कि मैं हूं... मगर मैं... मैं तो हूं ही... चाहे कुछ हाथ न आए... समूचे संघर्ष और उत्कर्ष के बाद खाली हाथ जहां मैं लौटता हूं, वह कौन है? मैं! सोहम्! अस्तित्व का सबसे बड़ा सच... जहां से सब शुरू होता है, और जहां सब लौट आता है... अनासक्त प्रेम की तरह!
 इस संसार में एक ही चीज शाश्वत है- मुझमें सदा से अज्ञात की सांस लेता- प्रेम! लेकिन कितना नवरूप और कितना क्षणजाया! समझ सको तो कितने प्यारे एडवेंचर हैं दुनिया में आने और जाने के!
 कितनी-कितनी बार वह इन अजात शब्दों को अपने भीतर नहीं जी चुकी? जैसे रोज एक नया पोस्टकार्ड उसके हाथ लगता है... एक नया संदेश... कि जो आशियाना तुम्हारे नाम है, उसे ढूंढ निकालो...
 उस रोज वह कितने पास आ गया था...
 कुछ लम्हों की वह मुलाकात... जैसे पानी का झलमला... जैसे हवा का झोंका... कितना काल्पनिक... कितना वास्तविक! पता ही नहीं चलता कब वह क्षण तुम्हारी बगल की सीट पर आकर बैठ जाता है और तुम उससे बातें करने लगते हो... अक्सर होंठ हिलाए बिना...
 ऐसे ही तो आया था वह...
 फिर एक झलक के साथ कुछ इबारतें भर देकर अपने रास्ते निकल गया था... उसे उसकी चुनी हुई जगह सौंपता। क्या अब कभी मिलना होगा? और क्या यह संभव होगा कि अचानक मिलें और फिर उसी तरह अपने रास्तों पर निकल जाएं? पीछे मुड़ कर देखें तक नहीं?
 ऐसे लोग क्यों बीच पगडंडी पर सामने आ जाते हैं, जिन्हें आप पहली नजर में पहचान तो लेते हैं, मगर पीछे से जरूरत भर आवाज में पुकार भी नहीं पाते? कोरे कागज की फड़फड़ाहट बन कर... अनलिखी किताब की आहट होकर रह जाते हैं...

 संगीत बदलती बस रुकती चलती रही... और बर्फ ढके पहाड़... और नदी भी।
 क्या है इन जगहों पर कि वह बार-बार चली आती है... अकेली... बिना थके... बिना रुके? नग्गर... सोलंग नाला... रोहतांग... केलांग... चंद्रताल... सिंधु नदी के आर-पार का लद्दाख... सांगला... ताबो, काजा, किब्बर... स्पिति... ये ऊंचे-नीचे पहाड़ी रास्ते- अपनी पीठों पर घास के गट्ठर लादे, ढलानों से उतरती हंसती-मुस्कराती स्त्रियां... छोटी-बड़ी लड़कियां... सत्तर-अस्सी साल तक की औरतें... जन्म से ही पहाड़ की जिंदगी... या पहाड़ सी जिंदगी को सहज स्वीकृति देतीं!
 हमारी पिछली यात्राएं ही अगली यात्राओं के डिजायन फंदे बना-बना कर बुनती हैं... हम उन्हें ठीक से समझ कर स्वीकार न करें तो आगे के सफर खुशनुमा कैसे हों? ‘लेकिन मैं?’ वह खुद से पूछती रहती है-
 क्यों भटकती हूं बार-बार... लगातार... यहां?’

 ‘‘तू पैदा कहीं भी हुई हो, है तू पहाड़ी परिंदा ही! ‘‘ एक औरत की सधी हुई आवाज थी... जब लद्दाख की सीमा तक पंजाब था... पांच आबों... सिंधु और चंद्रनीरा चन-आब से लेकर सजलुज तक पांच नदियों का बहुरंगा आयाम था... जब हिमाचल उसी के भीतर था... तब की एक जवान औरत की आवाज उसे उसकी मिट्टी में खड़ा कर देती है-
 ‘‘ये पहाड़ तुझे हमेशा पुकारते रहेंगे और तू एक दिन सदा के लिए इन्हीं की होकर रह जाएगी... तेरे मां-बाप भी दूर-दूर की दिशाओं से आकर यहीं तो मिले थे... तुझे जंगलों में छिपी-छिपी एक पगडंडी पर उतारने! बस, वो... एक क्षण... वो सहजन्मा लम्हा...जो तुझे तलाश कर रहा है... जिसे तू शिद्दत से लपक कर पकड़ लेना चाहती है... वो तुझे दिख भर जाए... और उसे देखते ही कोई जनूनी तड़प जग जाए तुझ में किसी भी बहाने... यों ही नहीं सीखी है तुमने यहां की जुबानें... यों ही नहीं छान मारे हैं तुमने सोहनी-महिवाल के मानीखेज अफसाने... यों ही नहीं आ गई तू एक ऐसी औरत की कोख में जन्म पाने, जिसमें कई नस्लों से आया रहस्य-रक्त अपनी देह के लिए सांचा तलाश करता है... अपनी रूह की रचना के नए सूत्र ढूँढता है... बेआवाज चीख में पुकार-पुकार कर... बेआहट कदमों से दौड़-दौड़ कर... ‘‘
 सहसा वह औरत इस घाटी की भाषा में भीगी हुई करवट बदलती है- ‘‘ऐंढी शोभली बांठण री कैंढी शोभली शोहरी... तू! (ऐसी बणी-ठणी स्त्री की कैसी सुंदर छोकरी है... तू!)... और मैं? जाने दे... मेरे जाने के बाद जानेगी कि पहाड़ कैसे-कैसे पुकारते हैं अपनी खोई हुई बारिशों और बर्फों को... हवाओं और पानियों को। इलाकों को लकीरों में बांट देने से तासीरें मर नहीं जातीं... स्रोत पर स्वाद सनातन है... तू बचाएगी उसे... अपने उस आपको, जिसे आज तक कोई समझ ही नहीं सका... न तुमने किसी को भनक लगने दी... ‘‘
 वह उस औरत... अपनी नानी को देखती रह गई थी... नई हैरानी से!
 इस तरह से पहले कभी नहीं बोली थीं वे...
 आज दिन भर दोनों खेत में काम करती रहीं... गांव से आई हुई सहायक स्त्रियों के साथ... खाना भी खेत में खाया। बचपन की आदतें नहीं जातीं, हाथों में चढ़ी मिट्टी चाहे रोज समूची हटा देना आसान है।
 रात सन्नाटा ओढ़ चुकी थी। उसने देखा था, नानी रोशनी बुझा कर ऑल इंडिया रेडियो से बह रही नदी में डूब गई हैं- मायूसी को गाकर भी बुझते जीवन को संजीवनी देने वाली लता की आवाज में... जहां ठंडी-ठंडी हवा चल रही है... किसी की मुहब्बत वहां जल रही है...वे कितने ही गीतों को उसकी मां और अपने माजी से जोड़ कर उदास हो जाती हैं... लेकिन यह उदासी किसी से कोई शिकायत नहीं करती... न मांग। आगे चलकर यह गीत उसके मां-बाप पर कुछ ज्यादा सही बैठता है- न तुम बेवफा हो... न हम बेवफा हैं... मगर क्या करें? अपनी राहें जुदा हैं...कम-अज़-कम उनकी तीन पीढ़ियों की दास्तान तो यह गीत कहता ही है- बर्फ में दबे अंगारों की... ज़माना कहे मेरी राहों में आ जा... मोहब्बत कहे मेरी बांहों में आ जा...
 उस रोज वह नानी का हाथ अपने सिर पर कंपता पाकर उनकी बगल में चुप सो गई थी। जब सारे हाथ साथ छोड़ देते हैं, हम बेसाख्ता किसी एक हाथ से समूचा सुकून पा लेना चाहते हैं... कोई हाथ सारे बिछड़े हुए हाथों को साथ लेकर चला आता है... फिर वे तो नानी थीं... असंभव सी...
 सुबह उसने रात के अपने सपने का अर्थ उनसे पूछा था- ‘‘मैं सपने में एक लेख पढ़ रही थी... शीर्षक था- कृष्ण कहते, मैं गायिकाओं में लता मंगेशकर हूं’! ‘‘
 ‘‘मगर यह लेख तो बरसों पहले मैंने सच में पढ़ा था... मेरे हाथ ने तेरी खोपड़ी के रास्ते तेरे दिल में पहुंचा दिया होगा... इसका सीधा-सा अर्थ है- हमारे खामोश गीतों से बनी गीता को रच सकने वाला कोई भी कृष्ण यही कहेगा कि नारीत्व दर्द की बारिश है और जो उसमें नहाना जाने, वही अमृत को पहचाने! अमृत ऊपर किसी जन्नत में नहीं बनते, हमारे भीतर कसीद होते हैं... हमसे बहते हैं। हर ऊपरके मायने हर भीतरके उरूज़ हैं... भीतरी बुलंदियों से लेकर बाहर की हदबंदियों के पार तक... जो औरत की छातियों... उसके उरोजों के भीतर परवान चढ़ते हैं और हर नए ईश्वर को दूध पिलाने को मचलते हैं... तमाम रूहानी आब लेकर... तमाम आसमानी शराब लेकर! देवकी जन्म दे और यशोधा दूध... वरना किसी स्त्रैणवंचित अप्रकृत पूतना के स्तनों में संचित विषदुग्ध को चूस फेंकने का हुनर और हौसला कोई कृष्ण कहां से लाए? ‘‘
 और मैया से मासूमियत के साथ कैसे पूछ सके कि राधा क्यों गोरी, मैं क्यों काला?’
 विष पीता हर कृष्ण कन्हैया... तुम कहते यूपी का भैया!

 लीजिए...
 पतली कूहल बस स्टाप आ गया।
 कुल्लू-मनाली रोड की सबसे ज्यादा सवारियां यहीं उतरती-चढ़ती हैं... विश्वप्रसिद्ध कलास्थली नग्गर को यहीं से दाहिने को रास्ता मुड़ता है। किसी वक्त यहां सिर्फ पानी की पतली सी धार बहती थी। आज उस धार के आर-पार एक छोटा सा शहर बस गया है- पतली कूहल! बहाव आगे निकल जाते हैं... समंदर होकर आकाश पर छा जाने को... और बहावों के आर-पार मनुष्य ठहर जाते हैं संगठित सरोकारों में रोने को... जीने के नाम पर कबाड़ ढोने को... पतली हो या हरिद्वार या बनारस जितनी चैड़ी, हर घाट पर आज जलधार लाचार है।
 बस आबादी से आगे बढ़ी तो नदी फिर साथ थी...
 दस मिनट के भीतर स्पैन रिसार्ट आ गया, जहां के विपाषतट पर दुनिया भर के संगठित अहंकार द्वारा बहिष्कृत अमीर फकीर ओशो ने कुछ दिन बर्फबारी के नीचे डेरा डाला था।
 और... ओ, हेलो... यह लो...

 15 मील आ गया...
 वालीवुड वालों का मशहूर शूटिंग स्थल... 15 माइल्स...
 वह जैसे कहीं दूर से लौटी और हड़बड़ा कर कुछ लोगों के पीछे बस से नीचे उतरी। बस अपना नया गीत गाती मनाली की तरफ निकल गई। उतरे हुए लोग पुल के रास्ते जंगल पार अपने गांवों की तरफ चले गए।
 वह नई-नई दोपहर की खिलती धूप में अकेली खड़ी है...ब्यास नदी पर बने झूला पुल को एकटक देखती...फिर पुल पार के 15 माइल्स के समूचे विस्तार को...
 कहीं कोई नहीं था...



 अगर किसी फिल्म की शूटिंग चल रही होती तो भीड़ होती और वह लौट जाती चुपचाप...लेकिन उसकी नजरें अभी जंगल और नदी तट को छान रही थीं... कहीं कोईतो हो...


 नहीं... कोई नहीं है।


 तो कोई नहीं आएगा अब

 उसने अपनी आंखें भीतर को मोड़ीं और जैसे जन्मों से जमी हुई प्रतीक्षा की ठंडी चट्टान को छुआ... जो बिना हिलेडुले पड़ी रहती है भीतर। वह पुल की ओर बढ़ी। दोनों तरफ से लोहे के रस्सों पर कंपता हुआ पुल... रस्सों के साथ बंधी बौद्ध मंत्रों से भरी कपड़े की झंडियां... दैवी शक्तियों को प्रसन्न करने के लिए रंगे हुए मंत्रचीर... अब इनसे कुछ नहीं ढांका जा सकता- ये झंडियां हवा में कांपती रहती हैं, आत्मा भीतर ठिठुरती रहती है।


 पुल के बाद सीधी-सपाट पक्की सड़क... दोनों तरफ देवदार और कैल के लंबे-घने पेड़... उनसे छन कर आती गुनगुनी घूप- जो कुछ देर पहले नीचे उतरती ठिठुर रही थी। पांवों के नीचे रात की ओस से सने नुकीले पत्ते, जो नए हरे पत्तों के लिए जगह छोड़ कर धरती की बिछावन हो जाते हैं। देवदार से झड़े गुलाबनुमा भूरे फूल... और उसके सखा... यानी चीड़ के अग्रज कैल से झड़े लंबे-भूरे लक्कड़फूल...


 धूप के टुकड़े के तले आकर उसने एक लंबा फूल उठा लिया और उसे नाक के करीब लाकर उसकी महक लेने लगी। सहसा उसे किसी की संकोच भरी चेतावनी सुनाई दी-


 ‘‘हेलो... फूल को संभल कर पकड़िए... इन फूलों का गोंद हाथों और कपड़ों से बुरी तरह चिपक जाता है और आसानी से नहीं छूटता...’’


 नहीं... किसी ने नहीं कहा... कहीं कोई नहीं था... यह तो उसने तब कहा था जब पहली बार मिला था... अचानक पास आकर... उसी के जैसा भटकता परिंदा... उसी के जिस्मोजान की पहचान सा... उसी की देहभाषा को गाता... कितना कंगाल- फटेहाल... और कितना मालामाल...


 उस वनैले क्षण की काष्ठ -गंध में समा कर एक नई और आत्मीय गंध उसके भीतर चली गई थी... पुरुषगंध... लेकिन सबसे अलग... पहले दिन से विकसित... आदिम और अदम्य...


 ‘‘मैंने जो कहा-- उसका पता यदि आपको पहले से है... और अगर आप पता होते या पता न होते हुए भी परवाह नहीं करतीं तो मेरी बात पर ध्यान न दीजिएगा... ‘’


 वह अपने भीतर हिली... ध्यान क्यों न दूं, उसी होश पर तो निश्चिंत हैं मेरी बेपरवाहियां... सुनती सब हूं... छूता वही है जो छू सके...


 ‘‘ओ. के. ‘’ प्रकट में वह इतना भी ठीक से नहीं कह पाई थी कि-


 ‘‘कुछ खुशबुएं इतनी प्यारी होती हैं कि आप उनकी कैसी भी संभावित छुअन से नहीं डरते... किसी भी हद तक! एवरी मोमेंट इटसेल्फ... टेक्स इट्स केयर... तो भी... प्लीज़ बी अवेयर... ‘’


 कह कर वह अपने रास्ते पर जाने के लिए मुड़ने लगा तो वह उससे आंखें मिला कर होंठों पर कुछ लाते-लाते चुप रह गई... और अपने चुप रह जाने के रहस्य को पकड़ लिए जाने को देखती रह गई... अपने उस सपने को पकड़ लिए जाने को... जो समझ में आ भी जाए, पर हाथ में नहीं आता...


 उसके होंठों पर जम गए शब्दों को पिघला गया वह- उस घड़ी के अपने इन शब्दों से- ‘’आय केन लिसन द सौंग ऑव योर साइलेंस इन माय मोमेंट... इस क्षण में बन रही एक ग़ज़ल में... ‘’


 ‘‘ग़ज़ल!’’ वह बिना बोले होंठ हिला कर रह गई।


 ‘‘तेरे बियाबां से मेरे याराने हैं... ये जंगल मेरे जाने-पहचाने हैं...


 ‘‘ओह...वह जहां की तहां ठहर गई... अपनी आंखों में उसके कहे का जवाब लेकर... उसे समूचा सुनते हुए-


 ‘‘मैं जब अपने होने पर हैरान होता हूं तो सहसा कोई आवाज सुनता हूं कि यहां तो अस्तित्व तक नहीं जानता कि वह क्यों है! उसे क्योंका नहीं- हैका शायद अबोध सा कुछ बोध हो। कहकशाओं या नक्षत्रों की ज्वलंत हैरानियों को... और मेरे या आपके होने की परेशानियों को यहां कौन पूछता है? बस, अटको मत... सतत भटको... चरैवेति... ‘‘


 ‘‘आह! ‘‘ वह होंठों पर एक तड़पती जुंबिश लेकर रह गई।


 दोनों की नजरें अब एक सेकेंड भर को मिलीं और जो होना था, वह हो गया... पता नहीं क्या?


 उसके मुड़ते-मुड़ते वह अपने होंठों पर आए कुछ शब्दों में से अंतिम शब्द को खुद भी सुन सकी थी- ‘‘थैंक्स... ‘‘ बोली वह इससे आगे भी थी... ‘‘... , वंडर... वांडरर... थैंक्स.. ‘‘


 वह चला गया... वह उसे दरख्तों में ओझल और खुद में उदित होते देखती रही।


 आज वह उस मुलाकात को जैसे फिर से देख रही है... और उस दिन के बाद अपने यहां तीसरी बार आने को भी... कि उसके भटकाव की पुकार अब किस मुकाम पर है? अब किसको खोज रही है? ‘वहक्या अब मिलेगा भी? क्या उसे मालूम है कि वह उसके होनेके साथ हो ली है? क्या उसने उसके मुंह से निकला वह थैंक्ससुना भी था? वरना एक पुरुष के लिए क्या यह एक शब्द काफी नहीं था ठिठक जाने और दुनियावी परिचय पा जाने को?


 उसने जो कहा था, वह दो के बीच का अनकहा अद्वैत था... मगर जो आसानी से समझा जा सकता है, वह साफ है... हर नए को छूने से पहले आसानी से भरी एक सावधानी बरतो... मस्ती से भरी एक कीमियागरी...वरना आगे खतरा है। रिश्तों की गोंद थोड़ी दूरी से छुओ... एक फासले से ठीक सा फोकस करके देखो तो कहीं कोई भय नहीं...


 देखने और छूने के ढंग अर्थ को बदल देते हैं... पर ये अर्थ भी आखिर हैं क्या? वह, जो तुम तय करते हो, या वह, जो वास्तव में है? लेकिन इस वास्तवको भी कौन तय करेगा? पहाड़, जंगल और नदी के भीतर अगर हमारे फलसफे प्रवेश कर जाएं तो रचना तो दूर, बचना असंभव हो जाए कुदरत के लिए... वरना चांद तक को खबर नहीं कि धरती पर उसके लिए हार्दिक आहें भरता मनुष्य उसे दिमागी तरीके से रौंद भी चुका है... अपने ज्ञान या विज्ञान की षान में... अपनी धरती को श्मशान बनाते हुए...


 दिमागी तर्क चिल्लाते हैं, दिल की दस्तकें सहमी-सहमी पुकारती हैं...


 सभी पुकारों को अनसुना कर उसने नदी की अतर्क्य पुकार को सुना और नदी की तरफ निकल गई... अपनी जीन्स के पांवचों को दो बार ऊपर को मोड़ा, जैकेट उतार कर बैग में डाला और बैठने के लिए एक सुनहरी-भूरी चट्टान चुन ली...


 एक चट्टान को दूसरी चट्टान चुनती ही नहीं... गुपचुप सुनती भी है।


 बैठते ही एक गर्म लंबी सांस बाहर फेंकी तो जवाब में अनायास भीतर नदी की नमहवाई सांसें भर गईं... अप्रयास...


 शीशे जैसा पारदर्शी पानी... और शीशे सा साफ मानी भी... कि बैठे मत रहो किनारे पर... कम एंड लेट फ्लो द सेल्फ... योर... प्योर सेल्फ! उसने खुद को थामे रखा। तभी लाल दुम वाली एक नन्हीं चिड़िया जाने कहां से आई और सामने की चट्टान पर उतर कर पानी में अपनी चोंच डुबोने लगी। परवाज को आसमानी रंग का पानी चाहिए आकंठ... और तरबतर हो पंख फटक-झटक कर सुंदरतर असुरक्षित उड़ान को...


 वह अपने भीतर उस रोज से लरजती एलियन इबारतों को भीतर थपक कर बाहर देखने लगी...


 पानी में उभरती चट्टानें... जैसे बड़े-बड़े कछुये बैठे हों... सिर्फ इतना नहीं, बल्कि अदृष्य में विचरती एक दूसरी दुनिया का अहसास भी... सिर्फ विज्ञान की ही मानें तो भी केवल हम रूपधारी लोग ही नहीं हैं इस प्लेनेट पर... अरूपों का एक बड़ा संसार भी है। उनसे बात करने का मन होता है... ओए, माहणुओ... परमाणुओ... सुन रहे हो न? हम तुम्हें तंग तो नहीं कर रहे?

 हाथ हिलाते ही ध्यान आता है कि पता नहीं कितने अदृष्य जीवों को परे हटा दिया... और उन्होंने हमें फिर-फिर घेर लिया होगा... एक संसार में कई संसारों के होने की अनुभूति उसे शिद्दत से पानियों से सटे निर्जन वनों में होती है।


 उसके विचार आहिस्ता-आहिस्ता मद्धम होते गए... भीतर जाकर नस-नस का रस हो चुका वह हदपार का हादसा अब शांत था। वह आत्मलीन हो आंखें बंद किए वहीं बैठी रही।

 आवाज से उसका ध्यान टूटा...


 वह संभली... देखा- नदी पार से कुछ लड़के मस्ती में सीटी बजा कर पुकार रहे हैं। एकांतों में अकेले विचरते ऐसी सीटियां सुनने की आदत है उसे... छोटे-छोटे लड़के भी जान जाते हैं कि लड़की का अकेले होना सदा से संदिग्ध है... या एक तमाशा...


 उसने झुक कर पानी पिया... बहुत ठंडा बर्फीला पानी... भीतर तक सिहरन दौड़ गई। फोन कैमरे से कुछ तस्वीरें उतार कर वह उठ खड़ी हुई। लड़के अभी सीटी बजा रहे थे। उसका परदेशी रूपरंग उन्हें कुछ ज्यादा शह दे रहा होगा। वह लौट चली... चट्टानों को कूद-कूद कर फलांगते हुए...


 पेड़ों की घनी ओट में पहुंच कर भी उसे लगा, वह देखी जा रही है। उसने पेड़ों के बीच के हर रिक्त स्थान पर नजर दौड़ाई... कहीं कोई नहीं था... लेकिन जो देख रहे हैं, उन्हें तुम नहीं देख सकतीं... क्योंकि अस्तित्व की निराकार नजरें सदा हम पर लगी रहती हैं... बड़ी उम्मीदों के साथ... ताकि हमारे जरिये स्त्री और पुरुष तत्त्वों से संपन्न यह विकासमान सृष्टि बची रह सके... क्योंकि सृष्टि को खतरा भी सिर्फ मनुष्य से ही है... उस मनुष्य से जो अभी बन रहा है... श्रेष्ठतम होने की खुशफहमियां पालता... सजातीय गिरोहों के आसरे पलता... प्रदर्शन की सत्ता के महानायकों की गलबंहिंयों का शिकार होता... मेहनत और शोहरत को जनमत के लिए भुनाता... कीच उछालने की सुविधा को साहित्य समझता... जीवंतता और अद्वितीयता से सदा चिढ़ा-कुढ़ा और भिड़ा हुआ मुर्दा मनुष्य... इसे अपने दम पर निर्भय जीने वालों से सदा बैर रहा... वह भी उधार का और संगठित!

 दरख्तों में से गुजरते हुए एक नए छोर पर उसे बैठने की अच्छी जगह मिल गई, जहां वह आराम से कुछ खा सके। सामने के टीले से एक झरना फिसल रहा था। उसने बैग खोला और नानी की दी हुई चीजें निकालीं...

 जैसे ही उसने एक सैंडविच उठाया, उसके सिर के ऊपर संकोच भरी आवाज मंडराई-

 ‘‘मे आय सिट हेयर... कैन आय,अगर आपको बाधा न पहुंचे? ‘‘

 उसने सिर उठाया और देखती रह गई...


 ‘‘ओ... यू...? ‘‘ जैसे उसकी रूह उसके तन-मन के हाथ पकड़ कर नाच उठी। उठने लगी तो उसने उसके कंधे पर हौले से हाथ रख कर रोक लिया और खुद भी बैठ गया।

 वह उसे कंधों पर से भारी-भरकम सैक उतारते देखती रही।

 ‘‘कैसी हैं आप? ‘‘ वह आवाज उसकी नसों में उतरती चली गई।

 ‘‘व्हेयर हैव यू बीन सो लौंग? जैसे 15 माइल्स में मेरे पंद्रह जन्म बीत गए... ‘‘ बोलते हुए वह उसकी आंखों में चाह कर भी नहीं देख सकी।

 दोनों जानते थे कि सिर्फ पंद्रह दिन पहले वे यहां मिले थे।

 वह उसकी पलकों के पीछे की चमक को देखता बोला, ‘‘हां... जैसे पंद्रह युग बीत गए... उस दिन लगा था कि बिछुड़े हुए मिल गए... ‘‘

 ‘‘और मिलते ही बिछुड़ गए... ‘‘

 ‘‘आज फिर मिलने को... ‘‘

 दोनों हंस पड़े।


 ‘‘सोचता था, आप जहां से आई हैं, वहां लौट गई होंगी। ‘‘

 ‘‘तब आप यहां आते ही क्यों? ‘‘ वह शरारत से मुस्कराई।

 ‘‘पौ फटते ही रोहतांग जाने को निकला था... पीठ पर यह ढेर सामान लेकर... लेकिन मनाली से आगे रास्ता बंद था... लौटते हुए घर तक की टिकट ली, मगर पता नहीं क्यों यहां उतर गया? ‘‘

 ‘‘नहीं जानते हम... कि कौन उतर आता है हम पर... और कहां उतार दिए जाते हैं हम... अंतिम सांस तक... या पहली सांस तक वापस... ‘‘

 ‘‘एक्जेक्टेली... नहीं जानता था कि आपके पास जा रहा हूं... आपको आपके बावजूद तलाश करने... इवन इनसाइड मायसेल्फ... उन निशानियों को फिर से देखने जो पिछली बार भीतर रह गई थीं... ‘‘

 ‘‘निशानियां आपने छोड़ी थीं, मैं तो अवाक् थी... ‘‘

 ‘‘मैं उस वक्त भी बता सकता था कि आप क्या कहना चाहती हैं... और अब भी... लेकिन नहीं बताऊंगा... क्योंकि आप मेरे जानने को तब भी जान गई थीं और अब भी जान रही हैं... ‘‘

 ‘‘कुछ छोड़ते ही नहीं आप मेरे लिए... क्या कहूं? ‘‘ वह अपने हाथ में पकड़े सैंडविच को देखने लगी।

 ‘‘यह भी छूटा रह गया है आपसे... ‘‘ उसने उसके हाथ को पकड़ कर सैंडविच उसके मुंह से लगाया और खुद दूसरा सैंडविच उठा लिया।

 ‘‘थैंक्स... ‘‘

 ‘‘किस बात का? ‘‘

 ‘‘क्योंकि आप जान गए कि मैं भूखी हूं और आप भी... ‘‘

 वह जोर से हंसा। फिर संजीदा स्वर में बोला- ‘‘आज मैंने दूसरी बार सुना... आपका थैंक्स... ‘‘

 ‘‘आह! ‘‘ उसकी जान निकल गई- ‘‘उस रोज सुन लिया था न! ‘‘

 ‘‘हां... ‘‘

 ‘‘देन अगेन थैंक्स... सोचती थी आप बहरे हैं। ‘‘

 ‘‘और मैंने तो गूंगी मान ही लिया था आपको। ‘‘

 अब दोनों बहुत हंसे... एक लंबी खामोशी में जाते-जाते...


 देर बाद-

 ‘‘मैं आज तक ‘15 माइल्सनाम का रहस्य नहीं समझी... ‘‘

 ‘‘यह जगह कुल्लू शहर से 15 मील आगे पड़ती है... यहां आबादी होती तो शायद कोई दूसरा नाम होता। अच्छा हुआ यह कुदरत बची रह गई और 15 माइल्स एक कुदरती नाम हो गया... रहस्यमय नाम... ‘‘

 ‘‘हमारी तरह... ‘‘

 ‘‘दैट्स व्हाय... ‘‘ वह पेड़ों के झुरमुटों में नजरें घुमाता और उसके गाल पर पड़ते भंवर तक लौटता बोला, ‘‘तभी तो दिस ‘15 माइल्सस्माइल्स... एंड दिस इज़ अवर न्यू माइलस्टोन... ‘‘

 उसने क्षण भर को उसकी आंखों के पार की लौ को देखना चाहा।

 ‘‘आपके लिए कुछ लाया हूं... अपने कॉटेज वाले बगीचे से... आप न मिलतीं तो अकेला इन्हें छू भी नहीं सकता था... ‘‘ वह अपने थैले की बाहरी जेब पर झुका और बहुत से अखरोट उसके सामने रख दिए। दोनों की नजरें देर तक मिलीं... दो जोड़ी पारदर्शी आंखें उन दोनों के अक्स अपनी पुतलियों में लेकर कुछ क्षण के लिए मुंद गईं। जैसे नदी ने अपनी तरलता और जंगल ने अपनी हरियाली भी उन आंखों में रख दी। अस्तित्व ने चुपके से उनकी तस्वीर उतार ली... क्लिक... अपने रिकार्ड के लिए।


 वह अखरोट तोड़ने लगी।
 ‘‘जब आप लेने का आग्रह नहीं रखते तो नेचर आपको आपका हिस्सा देने को मचल उठती है... ‘‘ वह उसकी हथेली पर अखरोट की गिरी रखते हुए बोली। हवा उनके नवेले रोमांच को अपने पंखों में लेकर पेड़ों पर जाकर गुनगुनाने लगी। वे सहज भाव से अपने साथ लाई चीजों को खा रहे हैं... मानों कई दिनों से साथ हों... जैसे सदा से... दूर-दूर रह कर बहुत पास...
 कभी-कभी समय और उसका बोध गिर जाता है... बहती नदी में जिस पल वहमिला, वही पल उसका... सूखे हुए पत्ते हों, तिनके हों, टूटी हुई टहनियां हों या बड़े-बड़े तने... या जंगल घने... या नदी में झिलमिलाते पहाड़ अनमने... मन षोर न मचाए तो हर चीज अपनी जगह ठिकाने से है... चैन से... अपने सही पते पर...


 दोनों पास की एक पगडंडी की तरफ उतरे, जो फूलों से भरी कंटीली झाड़ियों से घिरी थी। एक जगह हाथ बढ़ा कर वह झाड़ी को हटाने लगी तो उसने कहा, ‘‘इन्हें छुइए मत... बस सिर को झुका कर निकल जाइए। ‘‘ उसने वैसा ही किया और आगे निकल गई।

 चलने के सलीके आ जाएं तो कांटे भी रास्ता देते हैं।

 एक खुली जगह पहुंच कर वे ढलान की तरफ पैर लटका कर बैठ गए। सामने नदी नए रूप में थी।

 ‘‘यहां धूप गुलाबी है... और जोगिया भी... आपके गालों की तरह... ‘‘

 ये शब्द उसके भीतर कुछ जोर से पड़े... वह एक टंकार से भर गई और मुड़ कर उसकी आंखों में देखा... शरारत नहीं, एक सच था वहां... अविचलित!

 ‘‘मुझे नदी के बहाव के निकट बैठना बहुत अच्छा लगता है... पल-पल बदलने वाले जीवन जैसा बहाव... जो बीत जाता है, वह वापस नहीं आता... आप क्या सोचते हैं? ‘‘
 ‘‘आप यह भी जानती हैं कि कुछ ऐसा भी है जो नहीं बदलता... रूप चाहे कितने भी बदले... जैसे आकाश... जैसे धरती... जैसे... ‘‘

 ‘‘जैसे? ‘‘


 ‘‘जैसे आप... यह देखिए, अपना एक रूप... ‘‘ उसने उसके सामने अपने मोबाइल कैमरे की स्क्रीन कर दी, ‘‘आप चट्टान पर बैठी जब झुक कर पानी पी रही थीं, मैंने छिप कर आपकी तस्वीर उतार ली थी... लगा था कि कोई परी उतरी है आकाश से नदी पर... कितनी अनोखी हैं आप इस तस्वीर में... लेकिन घूमफिर कर हैं तो आप ही! ‘‘
 वह चकित थी... मैं इस तस्वीर में हूं या इस तस्वीर से बाहर? या दोनों से पार... कि दोनों में?’ वह एक आब्जर्वर हो गई... वह कौन है जो देह और छवियों के न रहने पर भी रूप धरने आता-जाता रहता है और हमसे हमारामिला कर ही मानता है?
 लेकिन एक शाश्वत अजनबी भी तो बैठा है भीतर।

 ‘‘क्या सोच रही हैं? ‘‘

 ‘‘आप बताइए... या अपनी रची किसी ग़ज़ल से बुलवाइए! ‘‘


 ‘‘जब भी खुद को हूबहू देखा, एक पराया शख्स रूबरू देखा... ‘‘

 ‘‘हां... यही... हूबहू... ‘‘


 वे लौट आए हैं...


 वह बैग में से पानी की बोतल निकाल रही है, जिसमें पानी बहुत कम रह गया है...


 ‘‘अभी जाकर पानी लाता हूं... ‘‘ वह बोतल लेकर नदी की ओर चला गया... वह उसे देखती रही... कैसे मिल गया है यह मुझे इस तरह? किसकी साजिश है यह? इसने मेरी प्रतीक्षा को हवाओं में... अपनी शिराओं में महसूस किया होगा... अपनी खोज की पगडंडियों पर मेरी आहट सुनता आया होगा... कैसे मिल गई मैं इसे? यह किसकी प्लान है?

 वह पानी लेकर लौट रहा है... पेड़ों में से छनती धूप में लंबे डग भरता चला आ रहा है... उसे इस तरह अपनी तरफ आते देखना कितना आह्लादकारी है... अपनी ही रहस्यमय आत्मीयता से सहसा साक्षात्कार!

 उसके भीतर एक नृत्य उठा... उसके लहू में नानी का प्रिय सूफियाना गीत ठाठें मारने लगा:

 यार पाया सैंयो... मैं तां अपणा आप गंवा के नी...

 वह कुछ और नजदीक चला आया है... वह देख रही है...

 मैं ता हर इक जाप भुला के नी... यार पाया सैंयो...

 हर जोग या संजोग उसी के लिए है, जिसमें हम समूचे उद्घाटित होते हैं।

 उसने पानी उसके हाथ में दे दिया है...


 वह बावरी सी हो गई है... हां...इस अमृत की तलाश में थी मैं... बस, यही एक... पढ़ लिया हमने इक-दूजे को... एक हुए हम... जिसमें हम हो सकते हैं, उस एक को अपने में ले लो... इक अलफ पढ़ो, छुटकारा है! अब क्या चाहिए? हम एक-दूसरे में से सारे वसंत उगा लेंगे... देहरियां और नेहरियां बना-बना कर... अपना एक घर... एक नगरी... और वो सारे रंग, जो हमसे बनने हैं...
 उसे अपने वजूद से फूटती कोंपलें महसूस हो रही हैं... पता नहीं कितने तप से मिली है यह दुर्लभ देह? कितने निराकार तरसे होंगे इस आकार के साकार को?

 एहि नगरी में होरि खेलो, री!उसने पानी का घूंट ऐसे भरा, जैसे पानी समेत पानी लाने वाले को घूंट-घूंट पी रही हो... अस्तित्व ने मुझे जो सबसे बड़ी नेमत दी है... मेरी काया... आज पहली बार उस पर सही-सही दस्तक सुनाई दी है...वह नानी के सारे गीतों का मर्म जानने लगी है... वे जब बहुत सुकून में होती हैं तो गाती हैं-

 धन! मोरी आज सुहागन घड़ियां...
 निहुरि-निहुरि मैं अंगना बुहारूं...


 वह उसे पानी पीते देख तृप्त हो रहा है... उसे पानी पकड़ा कर अब वह उसे देख रही है... पिछली बार उसने काली जैकेट पहन रखी थी, आज काले कोट में है...
 तुम्हें काला रंग बहुत पसंद है क्या?’ वह मन ही मन उससे पूछती है और खुद ही उत्तर देती है- नहीं, तुम्हारी खोज में सारे रंग एक रंग में छिप गए थे... विछोह के रंग में! अब देखना कितने रंग निकलेंगे, इस राज़ भरी रजनी में से...

 ‘‘बहुत ठंडा है न पानी... भीतर तक जमा देता है... ‘‘ वह उसके अंतिम घूंट के बाद बोली।

 ‘‘नहीं, भीतर तक पिघला देता है... बर्फ के भीतर एक खास तरह की गर्मी होती है... कभी स्नोफाल के तले देर तक घूम कर देखना... हवा ठहर जाती है... पसीने पड़ते हैं... ‘‘
 सब जानती हूं... बर्फ में जन्मी हूं मैं... लेकिन अभी नहीं बताऊंगी... छकाऊंगी बाद तक... देखना... सिर्फ हिंदी भर जानने वाली परदेशन समझ लिया है तुमने मुझे...वह मन ही मन बोली। फिर जाने कैसे हंसती-हंसती कह गई, ‘‘तुम्हें पड़ते हैं पसीने? ‘‘


 उसने उसकी हंसी को सलज्ज और रक्तिम कर दिया, ‘‘जितने इस वक्त पड़ रहे हैं, उतने नहीं! कहां से आ गई हो तुम... अकस्मात्? कैसे सहेजूं... कैसे संभालूं? मेरा पात्र छोटा पड़ गया है... कहां से लाऊं ऐसी बांहें, जिनमें यह नूर भरपूर समा सके... ‘‘
 वह आंखें झुकाए हंसी और मन ही मन बोली, ‘कुछ उपाय करो न!फिर चेहरा घुमा कर सामने चट्टानों से फिसलते झरने को देखती रही।


 जब तक वह उसकी ओर मुड़ती, वह अपने लंबे बैग में से अपना नन्हा तंबू निकाल पर उसे बगल में तान रहा था। वह हैरत से देखती रही... उसे याद आया कि उसकी मां के पास भी ऐसा ही नन्हा तंबू हमेशा रहता है। देखते ही देखते तंबू तन गया... वह उठी और उसमें घुस गई।


 ‘‘मेरा घर... ‘‘

 ‘‘हां... सिर्फ तुम्हारा... ‘‘

 ‘‘हमारा... ‘‘

 वह उसकी गोद के तकिये पर आंखें बंद किए पड़ी है।

 ‘‘तुम हो तो सब कुछ है... ‘‘ वह उसके भूरे बालों से खेल रहा है।

 वक्त ठहर गया है।

 ‘‘क्या सोच रहे हो? ‘‘

 ‘‘आय विल स्टे हियर टुनाइट... ‘‘

 ‘‘अलोन? ‘‘

 ‘‘विथ माय ऑल इन वन! नाउ आयम नॉट अलोन... ‘‘

 ‘‘यह तंबू कहां-कहां जा चुका है तुम्हारे साथ? ‘‘ उसने बात बदली।

 ‘‘हिमालय के कितने ही सीमांतों तक... लद्दाख में फौजियों के बीच... मस्त घुमक्कड़ों के रैनबसेरों में... कितनी ही कहानियां हैं... कुछ लिखी भी हैं... ‘‘

 ‘‘हम जैसे लोग रचे बिना कहां रह सकते हैं? ‘‘

 ‘‘हां... ओव्हरफ्लो होता है... इमेजिनेशन के पार... हकीकत के द्वार पर... दुनिया के बनाए सच से अलग... वहां तक, जहां हम नहीं रह जाते... कोई और चला आता है हम में हमारी कहानियां रचने... ‘‘

 वह उसे देखते-देखते सहसा धीमे से कह उठी- '‘तुमसे नया जन्म लूँगी मैं... एक नाम मिलेगा मुझे! अभी तक तुमने मेरा नाम भी नहीं पूछा... ‘‘

 ‘‘तुम में पनाह मिलेगी मुझे... मेरे द्वार को पार करोगी तो हमारे नाम हमारे होंठों पर आ जाएंगे... ‘‘ वह उसके देखने को देखता रहा।

 ‘‘हम सिर्फ साक्षी हैं इस होने के... है न? ‘‘ वह कहीं डूब गई।

 ‘‘हम इस कायनात के प्रति खुले रहें तो हमें पंख लग जाते हैं... क्योंकि हम स्वयं सृष्टि हैं... इसके स्वभाव का हिस्सा... एक ऐसी नथिंगनेस, जो अपने स्वभाव में ही एवरीथिंग है। ‘‘

 ‘‘असंभव का चिंतन सारे लॉजिक तोड़ देता है... ओ, मेरे नथिंग’... नाचीज... मेरे षून्य... ‘‘ उसके अंतिम शब्द पर वह चैंका। वह कहती रही-

 ‘‘कुछ और कहो... कहते रहो... ‘‘ उसने उसके माथे पर अपने दहकते होंठ रख दिए और अपनी गर्दन पर गर्माते उसके होंठों और सांसों को पीती रही।

 ‘‘वर्ड्सवर्थ अपनी रचना से जहां पहुंच जाते हैं, वहां आइंस्टीन हक्केबक्के हैं... जहां पहुँचते हैं, वहां भी उन्हें कहना पड़ता है कि कहीं नहीं पहुंचे... यात्रा भी बाहर ही होती रही... जो खोजा, वह हिरोशिमा और नागासाकी हो गया। तुम देखो... राधा या मीरा अपने चांद इसी धरती पर पा लेती हैं और टैगोर अपनी रचना में समूचे प्रेम को... ‘‘

 ‘‘मैं इसके अलावा कुछ नहीं जानती कि हमने एक-दूसरे को जाना है... ‘‘ उसने उसके सीने से लग कर उसके गले पर अपने होंठों को तड़पता-मचलता छोड़ दिया।

 ‘‘हां... यही! मेरी प्रकृति... मेरी वनपाखी... वन्या! ‘‘

 अब वह चैंकी उसके अंतिम शब्द पर।

 ‘‘यहीं से हम हर कहीं पहुंचते हैं अप्रयास... तुम्हें भूख लग रही होगी... ‘‘ वह उसका हाथ पकड़ कर बाहर आ गया और आसपास पड़ी सूखी लकड़ियां बीनने लगा। वह देखती रही... उसने दो पत्थरों से चूल्हा बना कर सुलगाया और थैले में से एक बहुत छोटा पतीला निकाला। उसमें पानी डाल कर चढ़ाया, फिर एक लिफाफे में भरा हुआ चाय का सामान निकाल लिया। चुटकियों में चाय बन गई और दो गिलासों में छन भी गई।

 वह अपने थैले से बिस्कुट निकालते हुए सहसा जोर से हंसी- ‘‘क्या हुआ? ‘‘

 ‘‘जब तुमने कहा कि मुझे भूख लग रही होगी... तब खयाल आया था कि शायद मेरी भूख के तले तुम्हें अपनी गर्दन खतरे में दिखाई दे रही है। उस घड़ी हंसना असंभव था मेरे लिए... ‘‘

 ‘‘भयंकर हो तुम! ‘‘

 ‘‘प्रलयंकर! ‘‘ वह नजरें नीची किए रही।

 ‘‘बुरा फंसा! चलो, इक बार फिर से...अजनबी बन जाएं हम दोनों... ‘‘

 ‘‘जरूरत नहीं है... वह हम सदा से हैं-स्त्री-पुरुष... असाध्य अजनबी! एंड दिस इज़ द ब्यूटी ऑव अवर एनकाउंटर... इसी में यात्रा है... नवनीत! बहुत तड़पेंगे हम मिलन और विछोह में... देखना! मुझे जैसे यह अहसास मां के गर्भ में हो गया था... मिलते ही नए रहस्य और नए दर्द हाथ लगते हैं... शायद भीतरी जगत में अभिन्न होने तक! ‘‘

 ‘‘कहां से आई हो तुम? ‘‘ वे फिर से तंबू में हैं।

 वह उसके सीने की टेक लिए सामने थिरकते झरने को देख रही है चुप... बंद आखों में उसके गर्म श्वासों की आंच से तपती... सिहरती...

 ‘‘बताओ न... ‘‘

 ‘‘यहीं पास से... पर्वत की बुलंदी वाले एक बाग से... अपनी ग्रेनी...नानी के यहां से... और मां बाप... ‘‘

 ‘‘मां-बाप...? ‘‘

 ‘‘वे जब एक-दूसरे से अलग होकर अपनी दिशाओं में निकल गए तो मैंने नानी को चुना। मेरे अधिकांश फलसफे नानी से विकसित हुए हैं... जैसे मेरी सखी हों... उनके भीतर एक ठेठ पहाड़न, एक पुरानी पंजाबन और अंततः एक एवरग्रीन लड़की हमेशा रहती है... मेरी भाषाओं... मेरे गीतों... मेरी सारी भीतरी यात्राओं की हमराज हैं वे... ‘‘

 तभी बगल में पड़ा उसका फोन बजने लगा-

 ‘‘कहां है मेरी हवा-हवाई? ‘‘
 ‘‘एक जन्नत की आगोश में! आपका ही जिक्र था जुबान पर... कुछ और उम्रदराज हो गईं आप! नानी... आज रात यदि मैं इस जन्नत में रुक जाऊं तो? ‘‘
 ‘‘अगर वह जन्नत तुम्हें गहरा सुकून और पनाह देती लगती हो... और तुमसे खुद को धन्य पाती हो तो रुक जाओ... यू कैन चूज योर हर इक चीज़... एंड चीज़ी... जस्ट बिकम मोर ईज़ी... ‘‘

 ‘‘लव यू, ग्रेनी... सुबह के सूरज के साथ आपको फोन करूंगी। ‘‘

 ‘‘खुश रहो... आयम नॉकिंग हैवनस डोर... आज तक के तमाम रूहानी रिश्तों और फरिश्तों से कहती हूं कि तुम्हारी और तुम्हारी जन्नत की हिफाजत और परवरिश करें... द एवर अननोन विल टेक केयर ऑव यू... ऑव योर यूनिवर्सल अवेरनेस... योर दिव्य दीवानगी... ‘‘

 वह ठगा सुनता रह गया, फिर बोला, ‘‘मैं तुम्हारी नानी के कदमों में झुक गया हूं... ऐसा क्या करूं कि उनकी यह अमानत उनके पास लौटने तक उनके लिए और भी बेशकीमती हो जाए... और उस अमानत के पहलू में मैं भी...? ‘‘

 ‘‘... ... ... ‘‘

 ‘‘कुछ सोच रही हो? ‘‘

 ‘‘नहीं... सुन रही हूं... ‘‘

 ‘‘कहीं और भी पहुंच गई हो... ‘‘

 ‘‘अपनी अनोखी मां की डायरी का एक प्रेम-पन्ना याद आ रहा है... सुनो... डायरी के उस पन्ने पर उनकी रची ये पंक्तियां भी हैं...

 मन ने जो माना, किया हमने...

 तन ने जो जाना, जिया हमने...

 छण ने जो छाना, पिया हमने...’ ‘‘


 ‘‘ओह! ‘‘ वह ठगा रह गया- ‘‘तुमने कभी उन्हें गाते सुना है? ‘‘

 ‘‘अब तो भीतर ही भीतर गाती होंगी... नानी बताती हैं कि जब मां मेरी उम्र की थी तो अकसर बाहर बाग में तंबू लगा कर सोतीं... देर रात नानी अचानक बाहर आतीं तो मां को गाती सुनतीं... ‘‘

 ‘‘जैसे? ‘‘

 ‘‘लता के गाए हुए गीत... जैसे शम्मा हो जाएगी जल-जल के धुआं आज की रात... आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे...अकेलापन... आउटसाइडर होने का अहसास... मिट जाने के क्षण की रचना... ‘‘

 ‘‘उन्हें क्या अच्छा लगता है? ‘‘

 ‘‘घूमना, पढ़ना... और लिखना... मगर वे न सिर्फ दूसरों का लिखा, बल्कि अपना लिखा भी इन्वर्टेड कॉमाज़ में ही रखती हैं... इसके लिए कोई सफाई नहीं देतीं... ‘‘

 ‘‘सफाई तो उथलेपन को चाहिए। जो सचमुच रचा जाता है, वह हमारे बावजूद आता है... हम तो बीच में होते हैं माध्यम भर... या इन्वर्टेड  कॉमाज़ से बाहर... हम जितना भी अनावश्यक रचते हैं, उसमें ही रचनाकार होने का दावा और छलावा कर सकते हैं। ‘‘

 ‘‘कितने अपने निकले तुम! ‘‘ वह देर तक आंखें मूंदे उसकी बांहों में पड़ी रही। फिर उसके होंठों से सिहरती... अपने तन, मन और क्षण को एक साथ लेकर उसके सीने में चेहरा छुपाए बोली- ‘‘पता नहीं कहां से आए हो... और क्या नाम है तुम्हारा? मगर इतना जानती हूं, मेरे लिए आए हो... हमारी आंखें अगर निर्मल हैं तो हम जो कर गुजरें वो कम... कयामत से कम न रह जाएं हम! ‘‘

 वह उसके होने में अनहोना सा हो गया।

 ‘‘अनकंडीशनल सरेंडर का शिकार हैं हम... ‘‘ वह उसके हाथों में मचलती बिजली से तड़पी, ‘‘हम थे ही नहीं कहीं और के! यहीं जान जानी थी... नहीं रह गए हम कहीं के... ‘‘

 ‘‘आंधी हो तुम! अब बस करो... ‘‘ जैसे उसने उसके कंपनों में छिपे पागलपन को सुन लिया।

 ‘‘अब तो यह आंधी तुम्हारा हर टैंट उखाड़ कर जाएगी... बहुत  शिद्दत से... इंपॉसिबल सी इंटेसिटी से पुकार पहुंचती रही है मुझ तक तुम्हारी... तुम्हीं ने पुकारा था न? अब डूबेंगे समंदर में... उड़ेंगे बवंडर में... और सुनो... ‘‘

 सहसा वह शाँत हो गई। उसने उसके छिपे हुए चेहरे को हाथों में लेकर उठाया, फिर उसकी बंद आंखों से फूटती धार को देखता रहा...

 निश्शब्द का सितार बजता रहा... उसने उसके आंसुओं को होंठों से छुआ... वह सिहर कर उसमें समा गई... उनके जिस्म और रूह एक होकर अपने सफर पर निकल गए... वहां... जहां सारे दुनियावी हवास ठगे रह जाते हैं... जहां कॉस्मिक मिलन से नक्षत्र थिरकते हैं। एक-दूसरे में समाने को विकसित होती हैं जिनकी अदृश्य बांहें, उन्हीं के नाजुक पांवों तले जमाने के दस्तूर चूर हो जाते हैं...इससे पहले कहीं कुछ अगर रचा जाता है तो वह सिर्फ ढोंग है या खुद को और दूसरों को दी जाने वाली खोखली तसल्लियां।





 रात का चैथा पहर...

 ‘‘कितनी अब्सेंट हो गई हो... कहां हो तुम... वन्या? ‘‘

 ‘‘शून्य में... तुम्हारे होने में विसर्जित... लव इज़ देयर... एवरीव्हेयर... ‘‘

 ‘‘अनगिनत शब्दकोषों में छानता फिरा मैं... तुम्हारा नाम... ‘‘

 ‘‘और तुम्हारा नाम... कि जब मैं पुकारूं तुम्हें... तो सुनूं सिर्फ मैं ही! ‘‘

 ‘‘व्हाट डू यू फील... माय लावन्या? ‘‘

 ‘‘द ज़ीरो एक्सपीरिएंस... मैं अपने नहीं होने को प्यार करती हूं, जो तुम्हारे होने से संभव है। ‘‘




 सुबह...

 ‘‘मेरी बहुत प्यारी और बहुत सारी नानी... सुन रही हैं आप? ‘‘

 ‘‘मेरी आवारा छोकरी... स्तब्ध हूं... आज तुम्हारी आवाज में एक नया ही साज़ है... एक म्यूजिकल और मदहोश सुर! चाहो तो शाम तक अपनी जन्नत में और रह लो... जी भर... ‘‘

 वह उनकी बातें सुन रहा है... उसने फोन के करीब मुंह लाकर कह ही तो दिया-

 ‘‘नानी... हमारी जन्नत आप हैं... मुझे अभी मिलना है आपसे... आपके कदम चूमने हैं... हम आ रहे हैं... ‘‘

 ‘‘अरे! मुझे तो पता ही नहीं था कि इस छोकरी ने किस जन्नत की बात कही है... यह तो और भी करिश्मा हुआ! तो मेरी अरण्या ने ढूँढ ही लिया तुम्हें! ‘‘
 ‘‘अरण्या? क्या यह इस वन्या का नाम है? सच? ‘‘
 वह चहक कर बोला- ‘‘और... नानी... मैं शून्यम्... ‘‘

 अब अरण्या चैंकी। उधर से नानी बोली- ‘‘बेड़ा गर्क... मेरे खानदान का! अब तक तुम लोगों को एक-दूसरे का नाम तक मालूम नहीं था? सिरफिरो.... कुछ होश करो! ‘‘

 अरण्या आशु कविता करने लगी- ‘‘होश वालों को अगर होश होते, तो सारे शादीशुदा ख़ानाबदोश होते... ‘‘
 देर तक रक्स करते तीन ठहाके गूंजते रहे।



 ‘‘शून्यम्...मैं पांच दिन और यहां हूं...फिर अपने काम पर लौटूंगी... परदेस... ‘‘
 ‘‘ये पांच दिन और पांच रातें मुझे मिल जाएं... ‘‘
 ‘‘बस? मेरे सारे क्षण... तमाम दिनरैन तुम्हारे हैं... हम इसी तरह मिला करेंगे... अचानक... और भरपूर... ‘‘
 ‘‘बहुत अद्भुत और अकस्मात् हो तुम! ‘‘
 एक सन्नाटे में आने के बाद भी दोनों मुस्कराए।


 ‘‘शून्यम्... कैसे मानूं कि मैंही अंतिम सत्य है... कि हर कहीं से लौट कर हम अपने ही पास चले आते हैं... अलोन! मैं नहीं मानती... ‘‘
 ‘‘कहो, क्या कहना चाहती हो? मेरा ही अनकहा कहोगी तुम... ‘‘

 ‘‘मैं नहीं तो तुम भी नहीं... शून्य है सब कुछ! अपने पास लौट आना और अपने पास बने रहना कितना आसान है... कहीं कोई चैलेंज नहीं...जुनून नहीं दूसरे में घर कर जाने का- अपने अज्ञात से छिटके होने के मस्त ऐलान का साहस! अहसास एक हो तो यहां सब अखंड है... शून्य में सबको समाना है और उसी में से रह-रह कर नवरूपों में लौट आना है... मैं ही तुम हूं... तुम ही मैं हूं... मेरे लौटने तक इस अलख को जगाए रखना... ‘‘ उसकी आंखें बरसने लगीं।

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